विंध्याचल की पहाड़ियों से निकलने वाली कर्मनाशा नदी का बक्सर के चौसा में गंगा नदी में संगम हो जाता है। इसकी पहचान शापित नदी के रूप में होती है। इसके बारे में कई पौराणिक कथाएं भी हैं। कहते हैं कि नदी की उत्पत्ति की कहानी के चलते प्राचीन समय में लोग पानी को छूने से डरते थे। लेकिन हकीकत कुछ और है।
शापित होने की लोक कथा होने के बावजूद भी कर्मनाशा नदी की प्राकृतिक सुंदरता देखने लायक है। नदी के दोनों तरफ हरे भरे खेत तो हैं ही। नदी के दोनों किनारों पर काफी संख्या में काले हिरणों का बसेरा है। लाखों किसानों और जीव जंतु के लिए लिए यह नदी जीविकोपार्जन का साधन है।
क्या है नदी के शापित होने की कहानी
वैसे तो तीन कहानियां हैं। लेकिन सबसे प्रचलित त्रिशंकु की कहानी मानी जाती है। एक पौराणिक कथा के अनुसार राजा हरिशचंद्र के पिता सत्यव्रत बेहद पराक्रमी थी। उनके गुरु थे वशिष्ठ। अपने गुरु वशिष्ठ से सत्यव्रत ने एक वरदान मांगा। उन्होंने गुरु वशिष्ठ से सशरीर स्वर्ग में जाने की इच्छा व्यक्त कर दी। लेकिन गुरु वशिष्ठ ने मना कर दिया।
इसके बाद सत्यव्रत नाराज हो गए और अपनी यह इच्छा विश्वामित्र के पास व्यक्त की। विश्वमित्र की वशिष्ठ से शत्रुता के कारण राजा सत्यव्रत की बात पर उन्हें स्वर्ग भेजने के लिए तैयार हो गए। विश्वामित्र ने अपने तप के बल पर यह काम कर दिया। इसे देख इंद्र क्रोधित हो गये और उन्हें उल्टा सिर करके वापस धरती पर 'भेज दिया।
विश्वामित्र ने हालांकि अपने तप से राजा को स्वर्ग और धरती के बीच रोक दिया। ऐसे में सत्यवत बीच में रुक गए और त्रिशंकु कहलाए। इस दौरान उनके मुंह से तेजी से लार टपकने लगी और यही लार नदी के तौर पर धरती पर प्रकट हुई।
माना जाता है कि ऋषि वशिष्ठ ने राजा को चांडाल होने का शाप दे दिया था और उनकी लार से नदी बन रही थी। इसलिए इसे शापित कहा गया।
192 किलोमीटर है लंबाई
बता दें कि कर्मनाशा नदी बिहार के कैमूर जिले से निकलती है और उत्तर प्रदेश में बहती है। ऐसे में यह नदी बिहार और यूपी को बांटती भी है। कर्मनाशा नदी उत्तर प्रदेश के सोनभद्र,चंदौली, वाराणसी और गाजीपुर से होकर बहती है। माना जाता है कि इस नदी का पानी छूने से बने बनाए काम बिगड़ जाते हैं।
इस नदी की लंबाई करीब 192 किलोमीटर है। इसका 116 किलोमीटर का हिस्सा यूपी में आता है। इसकी प्रमुख सहायक नदियां चंद्रप्रभा, दुर्गावती, करुणुती और खजूरी और कर्मनाशा नदी में देवदारी और चनपत्थर नाम के दो झरने भी हैं, जो अपनी ऊंचाई और विदेशी प्राकृतिक सुंदरता के कारण महत्वपूर्ण पर्यटक आकर्षण हैं।
बक्सर में गंगा नदी में हो जाता है संगम
कर्मनाशा नदी के तट पर डिहरी गांव के निवासी पुराणज्ञाता डॉ मनीष पाण्डेय द्वारा कहा गया कि कर्मनाशा नदी को लोकमान्यता के अनुसार कर्मनाशा नदी को शापित नदी कहा जाता है। लेकिन जैसे ही बक्सर के चौसा में गंगा नदी में मिल जाती है। इसे दोषमुक्त माना जाएगा।
उन्होंने कहा कि कर्मनाशा नदी का वर्णन तुलसीदास के रामचरित मानस में भी दो बार आया है। पौराणिक कथा के अनुसार नदी की महत्ता भले ही गौण हो लेकिन हकीकत में यह तटवर्तीय लोगो के लिए जीवन दायनी है। भले ही इसकी लंबाई कम है, लेकिन इस नदी कें दोनो किनारो की मिट्टी में उर्वरा शक्ति काफी है।
कर्मनाशा और गंगा नदी के तट पर बसे नरबतपुर गांव के रंगनाथ सिंह द्वारा बताया गया कि कर्मनाशा नदी का पानी जीवनदायनी है। इसके पानी को बहुत तरह के खेती के काम में आता है। पशुपालको और वन्य जीवो के लिए भी यह जीवनदायनी है।