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चंद्रदेव व दक्ष पुत्री रोहिणी की कथा जिस कारण चंद्रमा को मिला श्राप
Update On
01-January-1970 00:00:00
कहते हैं ना कि अति किसी भी चीज़ की अच्छी नही होती बस वैसा ही कुछ चंद्रमा के साथ (Chandra Dev Ko Shrap) हुआ। कहने को तो चंद्रमा एक देवता हैं जो पृथ्वी को शीतलता प्रदान करते हैं लेकिन उनके द्वारा भी कुछ ऐसी गलती हुई जिसका भुगतान उनको आज…
भगवान परशुराम के बारे में 10 रोचक तथ्य
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01-January-1970 00:00:00
भगवान परशुराम भगवान विष्णु के दस अवतारों में से एक (Parshuram Unknown Facts In Hindi) है। उनका जन्म ब्राह्मण कुल में हुआ था जो वामन अवतार के बाद तथा श्रीराम अवतार से पूर्व जन्मे थे। मान्यता हैं कि वे आज भी जीवित हैं तथा कलियुग के अंत तक वे जीवित…
भगवान परशुराम का कर्ण को श्राप जो उसकी मृत्यु का कारण बना
Update On
01-January-1970 00:00:00
भगवान परशुराम विष्णु के एक ऐसे अवतार हैं जो चिरंजीवी (Karan Ki Mrityu Kaise Hui) हैं। इसी कारण वे विष्णु के अन्य अवतारों के समयकाल में भी थे और अभी भी जीवित हैं। इसी के साथ उन्होंने भगवान विष्णु के बाद के अवतारों में भी अपनी भूमिका निभाई थी। यह…
देवी दुर्गा का रूप होती है छोटी बच्चियां, जानें क्या है कन्या भोज का धार्मिक महत्व
Update On
01-January-1970 00:00:00
हिंदू धर्म में नवरात्रि पर्व पूरे उत्साह के साथ मनाया जाता है। नवरात्रि पर्व के आखिर में अष्टमी व नवमी तिथि को कन्या पूजन किया जाता है। हिंदू पंचांग के मुताबिक, इस साल शारदीय नवरात्रि में कन्या पूजन 22 और 23 नवंबर को कर सकते हैं। पंडित चंद्रशेखर मलतारे के…
भगवान राम के गुरु ऋषि वशिष्ठ और राजा कौशिक की कहानी
Update On
01-January-1970 00:00:00
ऋषि वशिष्ठ महान सप्तऋषियों में से एक हैं. महर्षि वशिष्ठ सातवें और अंतिम ऋषि थे. वे श्री राम के गुरु भी थे और सुर्यवंश के राजपुरोहित भी थे. उन्हें ब्रह्माजी का मानस पुत्र भी कहा जाता है. उनके पास कामधेनु गाय और नंदिनी नाम की बेटी थी. ये दोनों ही मायावी थी.…
महान कृष्ण भक्त नरसी मेहता की कथा
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01-January-1970 00:00:00
नरसी मेहता महान कृष्ण भक्त थे. कहा जाता है कि भगवान श्री कृष्ण ने उनको 52 बार साक्षात दर्शन दिए थे. नरसी मेहता का जन्म जूनागढ़, गुजरात मे हुआ था. इनका सम्पूर्ण जीवन भजन कीर्तन और कृष्ण की भक्ति में बीता. इन्होंने भगवान कृष्ण की भक्ति में अपना सब कुछ…
परीक्षित के जन्म की कथा
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01-January-1970 00:00:00
जब द्रौपदी को खबर मिली कि उसके पांच पुत्रों को अश्वत्थामा ने मार डाला है, तो वह अनिश्चितकालीन उपवास पर बैठ गई और कहा कि वह उपवास तभी तोड़ेगी जब उसे अश्वत्थामा के माथे पर लगी मणि मिलेगी।अर्जुन अश्वत्थामा को पकड़ने के लिए निकले। अश्वत्थामा और अर्जुन के बीच भयंकर…
त्रिदेव में सर्वश्रेष्ठ कौन? महर्षि भृगु ने कैसे ली त्रिदेवों की परीक्षा
Update On
01-January-1970 00:00:00
एक बार महर्षि भृगु और अन्य मुनियों ने सरस्वती नदी के तट पर मिलकर यज्ञ का आयोजन किया। इस यज्ञ में नारद जी भी आए हुए थे। नारद जी ने सभी ऋषियों से पूछा कि आप लोग इस यज्ञ का फल किस देव को देना चाहते हैं।तब, इस पर ऋषियों…
भगवान श्री कृष्ण ने बताई हैं ये आदतें, जो व्यक्ति को नहीं बनने देती सफल
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01-January-1970 00:00:00
Bhagavad Gita Updesh महाभारत के युद्ध में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिया गया उपदेश भगवद गीता में निहित है। आज के समय में भी भगवद गीता की प्रासंगिकता उसी प्रकार बनी हुई है जिस प्रकार महाभारत की रणभूमि में थी। ऐसे में आइए जानते हैं भगवद गीता बताई गई…
अर्जुन को पाशुपतास्त्र कैसे मिला
Update On
01-January-1970 00:00:00
भगवान शिव का पाशुपतास्त्र (Pashupatastra) एक अमोघ अस्त्र माना जाता है। बात उस समय की जब हस्तिनापुर के कार्यकारी महाराज धृतराष्ट्र ने, सम्राट युधिष्ठिर को सभी भाइयों एवं पत्नी साम्राज्ञी द्रौपदी के साथ निमंत्रित किया था। परंतु कौरवों कि नियत गलत थी, जिसने जघन्य अपराध का रूप लिया। सम्राट युधिष्ठिर द्यूत में हार रहे थे, क्योंकि…
सभी एकादशियों में मोहिनी एकादशी सर्वश्रेष्ठ क्यों मानी जाती है।
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01-January-1970 00:00:00
मोह किसी भी चीज का हो, मनुष्य को कमजोर ही करता है। इसलिए मोह से छुटकारा पाने की कामना रखने वाले इंसान के लिए बहुत उत्तम है मोहिनी एकादशी का व्रत। इस एकादशी से और भी बहुत सारे फल और वरदान पाए जा सकते हैं। इस एकादशी को सभी एकादशी में…
महाराज बलि और भगवान विष्णु का वामन अवतार
Update On
01-January-1970 00:00:00
भक्त प्रह्लाद के पोते और राजा विरोचन के पुत्र थे महाराज बलि। राजा विरोचन की पत्नी सुरोचना ने महाराज बलि को जन्म दिया था। विरोचन के बाद महाराज बलि ही दैत्यों के अधिपति हुए और उन्हे दैत्यराज बलि भी कहते हैं। एक बार की बात है, तब समुद्र मंथन के बाद देवगन बहुत शक्तिशाली हो गये थे। तब देवासुर (देव–असुर) संग्राम हुए। उस संग्राम में देवताओं द्वारा महाराज बलि और उनकी दैत्यों और असुरों वाली सेना का भी नाश हो गया। उस युद्ध में इंद्र के वज्र द्वारा इनकी मृत्यु निश्चित हो गई थी। तब शुक्राचार्य जो की दैत्यगुरू थे, उन्होंने अपनी संजीवनी विद्दा के द्वारा महाराज बलि के प्राण बचाये।गुरु शुक्राचार्य का मार्गदर्शनअपने होश और प्राण शक्ति सँभालने के बाद दैत्यराज बलि ने गुरु शुक्राचार्य से पूछा “आचार्य मैं अपना राज्य, अपनी सेना और शक्ति वापस कैसे पा सकता हूँ?” तब इसके उत्तर में आचर्य ने कहा ” हे पुत्र! तुम महाभिषेक विश्वजीत यज्ञ करो इससे तुम्हे तुम्हारा हारा हुआ राज्य, अपनी सेना और शक्ति सभी पुनः प्राप्त हो जायेंगे। आचार्य की बातें सुन कर बलि यज्ञ करने को तैयार होगए। आचार्य की देख रेख में यज्ञ आरम्भ हुआ। इस यज्ञ में अग्निदेव ने प्रकट होकर महाराज बलि को सोने का दिव्य रथ दिया जिसमे चार घोड़े बंधे थे। वह रथ हवा की गति में दौड़ने की क्षमता रखता था। साथ ही साथ यज्ञ से बलि को दिव्य धनुष, बाणों से भरा तरकश और अभेद्द कवच प्राप्त हुआ। इसके साथ गुरु शुक्राचार्य ने बलि को भयंकर गर्जना करने वाला शंख और कभी न मुरझाने वाले पुष्पों की माला प्रदान की।यज्ञ के बाद बलिअपने यज्ञ को पूर्ण कर महाराज बलि महाशक्तिशाली बन गए। और एक बार फिर से देवासुर संग्राम का आह्वाहन किया। इस संग्राम मे देवता बुरी तरह पराजित हुए। केवल इतना ही नहीं अपितु देवराज इंद्र को युद्धस्थल छोड़ कर भागना पड़ा। दैत्यराज बलि यह संग्राम जीत कर स्वर्ग के राजा बन गए। अपनी विजय और बल का अहंकार भी उनके अंदर जन्म लेने लगा जो की पिछले हार के साथ सुप्त (सो) हो गया था।पुनः शुक्राचार्य से परामर्शयुद्ध के बाद उन्होंने अपने गुरु शुकराचार्य से कहा “हे आचार्य! आपके कहे का पालन कर मैंने अपना राज्य, बल और सेना वापस पा ली है, अब मैं आपसे कुछ और भी जानना चाहता हूँ“। यह सुन कर आचार्य ने कहा “निःसंकोच पूछो वत्स“। बलि ने पूछा “अपने राज्य बल और सेना को सुरक्षित रखने का क्या उपाय है“? तब दैत्यगुरु शुक्राचार्य ने उनका मार्गदर्शन करते हुए कहा “हे मेरे प्रिय शिष्य! यदि तुम निरंतर यज्ञ करते रहो तो कभी तुम्हारे बल में कमी नहीं आएगी अपितु वृद्धि होगी और इससे तुम्हारी सेना सुरक्षित रहेगी और इससे राज्य भी सुरक्षित रहेगा। मेरी एक और बात मनो तो, सदा गरीबों को और ब्राह्मणो को दान देते रहना, इससे जन्म लेने वाली ऊर्जा सदा तुम्हारे लिए हितकारी होगी।“बलि का संकल्पयह सब सुन कर दैत्यराज बलि ने हाथ जोड़ कर आचार्य की बातों का समर्थन और सम्मान किया और ऐसा आजीवन करने का संकल्प लिया। वो हमेशा चलने वाले यज्ञ करवाने और सदैव दान के लिए तत्पर रहने लगे। दान का अहंकार होगया उन्हें। शास्त्रों में कहा गया है अहंकार तो अपने आप में बुरी चीज़ है और जब अहंकार अच्छी चीज़ पर हो तो वह उसका भी नाश कर देती है। दैत्य लोगों को उनकी सुरक्षा प्रदान थी इस वजह दैत्य सबको कष्ट पहुंचाने लगे। आम जीवन परेशान हो गया।देव माता अदितिउधर देव माता अदिति इस देवासुर संग्राम से हताश होगयीं थी। उनके पुत्र निर्वासित जीवन व्यतीत करते रहे थे। उनके पुत्र देवराज इंद्र देवगुरु वृहस्पति के कहे अनुसार घोर तपकर रहे थे। यह सब देख कर माता अदिति विचलित हो रहीं थी। फिर अपने पति महर्षि कश्यप के कहे अनुसार भगवान विष्णु की अराधना करने लगी। उनकी अराधना से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उन्हें दर्शन दिये। प्रभु के दर्शन से प्रसन्नचित होकर माता अदिति ने प्रभु से कहा “हे परमेश्वर! आप देवासुर संग्राम से अवगत हैं ही, मेरे पुत्रों की दुर्दशा देखिये और देवताओं की सहायता कीजिये। दैत्यों के प्रकोप से देवता के साथ आम जनो का जीवन भी संकट में है प्रभु।“भगवान विष्णु का वरदानऐसी विनती सुन प्रभु ने अदिति माता से कहा “हे देवमाता! मैं अपने भक्त से युद्ध नहीं कर सकता ना ही उसकी मृत्यु का कारण बन सकता हूँ परन्तु मैं आपके गर्भ से वामन अवतार लूंगा और देवताओं सहित सबका कल्याण करूँगा“। प्रभु के कहने अनुसार माता अदिति को एक पुत्र की प्राप्ति हुई। उनके पति महर्षि कश्यप ने ऋषियों के मन्त्रों उच्चारण द्वारा अपने पुत्र वामन का यज्ञोपित संस्कार करवाया। यज्ञोपवीत संस्कार के बाद भगवान वामन महाराज बलि की निरंतर चल रहे यज्ञ वाले यज्ञशाला की ओर चल पड़े।भगवान वामन का आगमनवहाँ उपस्थित लोगों ने देखा एक छोटा सा ब्राह्मण बालक जिसके मुख पर अतुलनीय आभा थी। वह बालक का रूप बहुत हि मनमोहक था। उनके तेज से हर कोई प्रभावित हो रहा था। महाराज बलि और उनके यज्ञ में सम्मिलित गन उनके स्वागत में खड़े हो गये। महाराज बलि ने ब्राह्मण रुपी वामन भगवान शाही आसान पर बैठाकर उनके पैर धोये (पाद प्रक्षालन) किया और फिर चरण स्पर्श कर प्रणाम किया। दैत्यराज बलि ने ब्राह्मण बालक रूपी भगवान वामन से कहा– “भगवन! आपके आने से मैं धन्य हुआ, आप इस यज्ञ में पधार कर यज्ञ की ऊर्जा में बढ़ोतरी की है। मैं आपको दान देने की इच्छा रखता हूँ। आप आदेश दें प्रभु“तीन पग भूमिभगवान वामन देव ने कहा “आप दानवीर हैं राजन! आपकी बहुत प्रशंसा सुनी है। आप अन्न, धन, वस्त्र, सुविधा इत्यादि दान करने के लिए जाने जाते हैं। परन्तु मुझे ये सब नहीं चाहिए। मुझे केवल उतनी भूमि चाहिए जितनी भूमि मेरे तीन पग (कदम) में नप जाये। वहां उपस्थित लोग ब्राह्मण बालक की मांग को सुन हंसने लगे। महाराज बलि भी अहंकार में आकर हंस पड़े। फिर हाथ जोड़ कर वामन देव से और भी कुछ मांगने का आग्रह किया परन्तु वामन देव तीन पग भूमि पर अड़े रहे।शुक्राचार्य की चेतावनीफिर जैसे ही अहंकार में अंधे महाराज बलि दान देने के लिए हामी भर कर आगे बढे, तब ही उनके गुरु शुक्राचार्य ने उनसे कहा “हे बलि! ये बालक ब्राह्मण कोई और नहीं स्वयं श्री हरी विष्णु हैं, सोच समझ कर संकल्प लेना“। उनकी बात सुनकर दैत्यराज बलि ने बालक ब्राह्मण को देखा और प्रभु की अनुभूति करते हुए बोले ” हे गुरुवर! सम्पूर्ण यज्ञ तो प्रभु की प्रसन्नता के लिए होती है, हर आहुति प्रभु को प्रसन्न करने के लिए दी जाती है,यदि आज प्रभु स्वयं यहाँ दान लेने आएं हैं तो इससे सौभाग्य पूर्ण और क्या होगा? क्रोधवश दैत्यगुरु ने उन्हें शाप दे दिया और उस शाप की चिंता किए बिना ही महाराज बलि दान के लिए आगे बढ़ गए। भगवान वामन सब सुन रहे थे।महाराजा बलि का दानवामन देव से दैत्यराज बलि ने कहा “ब्राह्मण को दान के लिए आशवस्त कर मैं अपनी बातों से विमुख नहीं हो सकता आखिर मैं दानवीर हूँ। ऐसा तो आपने भी कहा है भगवन! इसलिए आप अपने पग बढ़ाएं, मैं आपको आपकी नापी हुई तीन पग भूमि दान करने का संकल्प लेता हूँ। संकल्प के साथ ही ब्राह्मण बालक रुपी वामन अवतार श्री हरी विष्णु ने विराट रूप धरा। लोग भयभीत होकर इधर उधर भागने लगे, यज्ञ में सम्मिलित जन हों या यज्ञद्रष्टा या फिर पशु सब ही भागने लगे। प्रभु ने एक पग में धरती और दूसरे पग में आकाश को नाप दिया और फिर तीसरे पग के लिए अपने पैर उठाये और बलि की ओर देखा। तभी बलि ने हाथ जोड़ कर अपने घुटनों पर बैठ कर कहा “हे प्रभु! तीसरे पग में आप मुझे नाप लें और मुझपर भी स्वामित्व स्थापित कर ले, यह रहा मेरा मस्तक आपकी सेवा में, आप मेरे मस्तक पर पग धरें।बलि…
इन ऋषियों ने किए हैं अद्भुत कारनामे, आधुनिक विज्ञान भी है नतमस्तक
Update On
01-January-1970 00:00:00
भारत की धरती को ऋषि, मुनि, सिद्ध और देवताओं की भूमि पुकारा जाता है। यह कई तरह के विलक्षण ज्ञान और चमत्कारों से भरी पड़ी है। सनातन धर्म वेद को मानता है। प्राचीन ऋषि-मुनियों ने घोर तप, कर्म, उपासना, संयम के जरिए वेद में छिपे इस गूढ़ ज्ञान और विज्ञान…
महाराजा शिवि की कहानी
Update On
01-January-1970 00:00:00
भारतीय धार्मिक कहानियों में महाराजा शिवि की कहानी (Maharaja Shivi Ki Kahani) प्रमुख है। पुरुवंश में जन्मे उशीनर देश के राजा शिवि बड़े ही परोपकारी और धर्मात्मा थे । परम दानवीर राजा शिवि के द्वार से कभी कोई खाली हाथ नहीं जाता था। प्राणियों के प्रति राजा शिवि का बड़ा…
भगवान जगन्नाथ को भिक्षा क्यो मांगनी पडी।
Update On
01-January-1970 00:00:00
दोस्तो एक बार लक्ष्मी देवी अपनी भक्तिन श्रेया चांडाल के घर पर आर्शीवाद देने गई हुई थी वहाँ से निकलते हुये उन्हे भगवान जगन्नाथ और बलराम ने देख लिया अब बलराम जी को यह बात बिल्कुल भी पसंद नही आई कि लक्ष्मी जी एक चांडाल के घर मे जाकर आई…
सुदामा को पूरी जिंदगी गरीबी क्यो झेलनी पडी।
Update On
01-January-1970 00:00:00
कथा के अनुसार एक अत्यंत गरीब ब्राम्हणी थी। वह भिक्षा मांगकर अपना गुजारा करती थी। दुर्भाग्य से एक समय ऐसा आया कि जब उसे पाँच दिनो तक भिक्षा नही मिली तो वह पाँचो दिन भगवान को याद करके सोती थी। छवे दिन उसे दो मुट्ठी चना मिला। चना पाकर वह…
अंगुलिमाल कौन था जरूर जानें।
Update On
01-January-1970 00:00:00
बहुत समय पहले की बात है। मगध राज्य मे अंगुलिमाल नाम का एक खूंखार डाकू रहता था। वह जंगल मे रहता और इलाके से गुजरने वाले राहगीरों को मारकर लूट लेता था वह जिस भी राहगीर को जान से मारता उसकी एक अंगुली काट लेता था और फिर उन अंगुलियों…
भगवान दूसरो की मदद कब करते है।
Update On
01-January-1970 00:00:00
भगवान का मतलब भूमि, गगन, वायु और नभ इन सबसे मिलकर बना है भगवान शब्द। हमारे हिंदू धर्म शास्त्र के अनुसार 33 करोड देवी देवता है लेकिन दोस्तो क्या आपको पता है वास्तविकता मे भगवान सिर्फ एक ही होता है और वही पूरी दुनिया का मालिक होता है। भगवान गीता…
प्रभु श्रीराम के साथ चलते थे बादल, ताकि उन्हें धूप न लगे, जानिए रोचक कथा
Update On
01-January-1970 00:00:00
वनवास के दौरान श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण जी के साथ अत्रि मुनि के आश्रम में पहुंचे थे। प्रणाम कर आशीर्वाद ग्रहण किया। सीता जी उनकी पत्नी अनसूया से मिलीं। उन्होंने सीता को स्त्री और पतिव्रत धर्म के बारे में बताया। कहा, देवी आप आदर्श हैं और जानती हैं कि…
जब सांख्यायन राक्षस ने चुरा लिए थे वेद, भगवान विष्णु से 4 माह चला था युद्ध, जानें क्या है पौराणिक कथा
Update On
01-January-1970 00:00:00
हिंदू धर्म में देवउठनी एकादशी को शुभ कार्य के शुरुआत के रूप में देखा जाता है। ऐसा माना जाता है कि 4 माह की योग निद्रा के बाद जब देवउठनी एकादशी पर भगवान विष्णु जागते हैं तो सृष्टि का संचालन अपने हाथों में लेते हैं और इसी के साथ शुभ…
भीष्म पितामह को बाणो की सैय्या पर क्यो लेटना पडा।
Update On
01-January-1970 00:00:00
आप सभी भीष्म पितामह के बारे मे अच्छी तरह से जानते होगें ये माँ गंगा के पुत्र थे। ये बडे ही धार्मिक प्रवृत्ति के थे। इसके बावजूद भी इन्हे मृत्यु के समय बाणो की सैय्या मिला। एक महापुरुष होने के बावजूद इन्हे इतना बडा कष्ट झेलना पडा। इनके पूरे शरीर…
भगवान भोलेनाथ ने कोढी का रूपधारण क्यो किया।
Update On
01-January-1970 00:00:00
एक बार भगवान भोलेनाथ माता पार्वती के साथ गगन विहार कर रहे थे अर्थात आकाश मे घूमने के लिये निकले थे। घूमते-घूमते भगवान भोलेनाथ संगम नगरी पहुंच गये जहाँ पर सभी लोग गंगा स्नान करने के लिये जा रहे थे। तब माता पार्वती ने भगवान भोलेनाथ से कहा कि प्रभु…
वेद व्यास और शुकदेव की सीख बच्चों की बातें भी ध्यान से सुननी चाहिए
Update On
01-January-1970 00:00:00
वेद व्यास और शुकदेव से जुड़ा प्रसंग है। चारों वेदों का संपादन करने वाले वेद व्यास के यहां शुकदेव का जन्म हुआ था। शुकदेव जन्म लेते ही ज्ञानी और वैरागी हो गए थे।शुकदेव बहुत प्रतिभाशाली थे। जन्म लेने के तुरंत बाद शुकदेव अपना घर छोड़कर जा रहे थे। उस समय…
समुद्र मंथन का आठवां रत्न लक्ष्मी, कैसे सागर से निकलीं और क्यों विष्णु को वर चुना
Update On
01-January-1970 00:00:00
सबसे पहली मान्यता धरती पर लक्ष्मी के प्रकट होने की है। मार्कंडेय पुराण कहता है कार्तिक अमावस्या की रात में जब चारों ओर अंधेरा था, तब एक देवी कमल के फूल पर बैठी प्रकट हुईं, उनके आते ही चारों ओर उजाला हो गया। ये देवी लक्ष्मी थीं।श्रीमद् भागवत पुराण कहता…
गांधारी अपने पुत्र दुर्योधन को निर्वस्त्र क्यो देखना चाहती थी जरूर जानें
Update On
01-January-1970 00:00:00
गांधारी को आप सभी लोग जरूर जानते होगें। गांधारी भगवान भोलेनाथ की बहुत बडी भक्त थी। एक बार गांधारी ने भगवान भोलेनाथ की बहुत कठिन तपस्या की। गांधारी की तपस्या से प्रसन्न भगवान भोलेनाथ ने गांधारी को यह वरदान दिया कि वह जिस किसी को भी अपने नेत्र की पट्टी…
हनुमान चालीसा कब तथा किसने लिखा था
Update On
01-January-1970 00:00:00
कलियुग मे भी हनुमान जी अमर है। हनुमान चालीसा पढने से रोग, दोष, कष्ट, भूतप्रेत सब भाग जाते है। यह अवधी मे लिखी एक काव्यात्मक कृति है जिसमे भगवान श्री राम के भक्त हनुमान जी के गुणों और कार्यों का चालीसा चौपाईयो मे वर्णित है। हनुमान चालीसा को गोस्वामी तुलसीदास…
महाभारत का युद्ध क्यो हुआ था जरूर जानें
Update On
01-January-1970 00:00:00
महाभारत का युद्ध 22 नवम्बर 3067 ईसा पूर्व मे हुआ था। उस समय भगवान श्री कृष्ण 55 या 56 वर्ष के थे। कुछ विद्वानों के अनुसार महाभारत युद्ध के समय भगवान श्री कृष्ण की उम्र 83 वर्ष थी। महाभारत युद्ध के 36 वर्ष के बाद भगवान श्री कृष्ण ने अपनी…
महाभारत के युद्ध मे हनुमान जी अर्जुन के रथ पर क्यो विराजमान थे जरूर जानें।
Update On
01-January-1970 00:00:00
महाभारत युद्ध मे अर्जुन के रथ का सारथी स्वयं भगवान श्री कृष्ण बने थे। यदि आपने महाभारत युद्ध को ध्यान से देखा होगा तो अर्जुन के रथ की ध्वजा पर स्वयं हनुमान जी विराजमान थे। महाभारत के युद्ध मे सबका रथ टूट गया लेकिन अर्जुन के रथ का कोई बाल…
नरसी भगत की कहानी
Update On
01-January-1970 00:00:00
नरसी जी भगवान श्री कृष्ण के बहुत बडे भक्त थे। नरसी जी जब पैदा हुये थे तब ये अंधे और गूगे दोनो थे। नरसी के जन्म के पश्चात इनके माता पिता का देहावसान हो गया था। अब इनके परिवार मे इनकी दादी और भाई भाभी थे। नरसी जी के दादी…
मीराबाई कौन थी जाने पूरी जानकारी।
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01-January-1970 00:00:00
मीराबाई बहुत बडी कृष्ण भक्त थी। इनका जन्म सन् 1998 ई. मे मेडता के राठौड़ राव दूदा के पुत्र रतन सिंह के यहाँ कुडकी गाँव मे मेडता ( राजस्थान) मे हुआ था। इनके पिता का नाम रतनसिंह राठौड़ था ये जमींदार थे तथा मीराबाई के माता का नाम वीर कुमारी…
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