नर्मदा नदी को भारत मे सबसे प्राचीन नदियों मे से एक तथा सात पवित्र नदियों मे से एक माना जाता है। यह मध्यप्रदेश और गुजरात की जीवन रेखा है परंतु इसका अधिकतर भाग मध्यप्रदेश मे ही बहता है। इस नदी के तट पर प्राचीन तीर्थ तथा नगर है। यह देश की सभी नदियों की अपेक्षा विपरीत दिशा मे बहती है। गंगा नदी की तरह पावन नर्मदा नदी से निकलने वाले पत्थर को शिवलिंग कहा गया है चूंकि यह शिवलिंग नर्मदा नदी से निकलता है
इसीलिये इसे नर्मदेश्वर भी कहा गया है। यह शिवलिंग घर मे भी स्थापित किया जाता है तथा इसकी पूजा भी की जाती है। इस शिवलिंग की पूजा शास्त्रों मे फलदायी बताई गई है। शास्त्रो मे कहा गया है कि मिट्टी या पाषाण से करोडो गुना अधिक फल स्वर्ण निर्मित शिवलिंग से मिलता है। घर मे इस शिवलिंग को स्थापित करते समय प्राण प्रतिष्ठा की आवश्यकता नही पडती है। गृहस्थ लोगो को नर्मदेश्वर शिवलिंग की पूजा प्रतिदिन करनी चाहिये।
इस कथा का वर्णन स्कंदपुराण मे मिलता है। एक बार भगवान शिव ने माता पार्वती को भगवान विष्णु के शयनकाल मे द्वादशाक्षर मंत्र का जाप करने के लिये कहा। पार्वती जी ने भोलेनाथ से आज्ञा लेकर चर्तुमास शुरू होने पर हिमालय पर्वत पर तपस्या करने लगी। माता पार्वती के तपस्या मे लीन होने पर भगवान भोलेनाथ पृथ्वी पर विचरण करने लगे।
भगवान भोलेनाथ यमुना नदी के किनारे हाथ मे डमरू लिये माथे पर त्रिपुण्ड लगाये बढी हुई जटाओ के साथ मनोहर दिगंबर रूप मे मुनियों के घरो मे घूमते हुये नृत्य कर रहे थे। कभी वे गीत गाते तो कभी नृत्य करते तो कभी हसते तो कभी क्रोध करते और कभी मौन हो जाते थे। उनके इस सुंदर रूप पर मोहित होकर बहुत सी मुनि पत्नियां भी उनके साथ नृत्य करने लगी। मुनिजन शिव के इस रूप को नही पहचान पाये बल्कि उन पर क्रोध करने लगे। सभी मुनियो ने क्रोध मे आकर शिव को श्राप दे दिया कि तुम लिंगरूप हो जाओ।
उसके बाद शिव जी वहाँ से अदृश्य हो गये तथा उनका लिंगरूप अमरकंटक पर्वत के रूप मे प्रकट हुआ तथा वहाँ से नर्मदा नदी शुरू हुई तथा शिव की स्तुति करने लगी। तब शिव ने माँ नर्मदा को यह वरदान दिया कि हे नर्मदे! तुम्हारे तट पर जितने भी पत्थर है वे सब मेरे वरदान से शिवलिंग हो जायेंगे तथा तुम्हारे दर्शन मात्र से सम्पूर्ण पापो का नाश हो जायेगा यह वरदान पाकर माँ नर्मदा अत्यंत प्रसन्न हुई। दोस्तो इसीलिये कहा जाता है कि नर्मदा का हर कंकर शंकर है। इसी वजह से नर्मदा नदी मे जितने भी पत्थर है वे सब शिवरूप है।