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क्यों आज तक चंबल के नाम से कांप जाती है लोगों की रूह, क्या है चंबल नदी का रहस्य…

Updated on 01-01-1970 12:00 AM

एक ऐसी नदी जिसमें पानी नहीं बल्कि खून बहता था, एक ऐसी नदी जिसमें मछलियों नहीं लाशें तैरती थी। एक ऐसी नदी जो प्यास नहीं बुझती, बल्कि आपको प्यासा बनाती है। प्यासा प्रतिशोध का… प्यासा प्रताड़ना का… प्यासा प्रतिष्ठा का… जब- जब चंबल के जंगलों की बात होती है तो लोग डर से कापने लगते है। आज भी चंबल में जाने से पहले हर इंसान सोचता है कि कहीं वहां उसका किसी डाकू से सामना ना हो जाए, या कुछ हादसा ना हो जाए। लेकिन ये बीहड़ बना कैसे? आइए जानते है…

करीब 900 कीलोमीटर के क्षेत्र में फैली ये नदी भारत की एक लौती नदी है जो प्रदूषण से मुक्त है, पर इस नदी के पानी का ना तो कोई सेवन करता है। वैसे तो चंबल को एक शापित नदी के नाम से भी जाना जाता है। यह नदी राजस्थान से बहती हुई उत्तर प्रदेश के इटावा जिले के मुरादगंज स्थान में यमुना नदी में मिल जाती है। इस नदी की सहायक नदियां काली, पार्वती, बनास, कुराई, बामनी, शिप्रा आदि हैं।

चंबल का इतिहास:

महाकाव्य महाभारत में चंबल का उल्लेख चर्मण्यवती के रूप में किया गया है। ऐसा माना जाता था कि यह राजा रंतिदेव द्वारा बड़ी संख्या में बलिदान किए गए जानवरों के रक्त का परिणाम था। एक पौराणिक कथा के अनुसार, द्रौपदी ने नदी को श्राप दिया था जिसके कारण लोग इसका उपयोग नहीं करते थे। शायद इसी वजह से इस नदी को पवित्र नदियों का दर्जा नहीं दिया जाता है लेकिन इसकी कहानी अत्यंत दिलचस्प है। चंबल आज देश की सबसे प्राचीन नदियों में से एक है और यह पानी के जानवरों की कई प्रजातियों के लिए एक प्रवास के रूप में सामने आई है।

कम हो जाता है चंबल का पानी:

चंबल एक वर्षा आधारित नदी है और इसलिए गर्मियों के महीनों के दौरान इसका जल स्तर नीचे चला जाता है, लेकिन इसमें 143,219 वर्ग किमी से अधिक का जल निकासी बेसिन है। जलविद्युत शक्ति का दोहन करने और सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध कराने के लिए चंबल घाटी परियोजना के हिस्से के रूप में नदी पर तीन बांध और एक बैराज बनाया गया है। राजस्थान और मध्य प्रदेश की सीमा पर गांधी सागर बांध, चित्तौड़गढ़ जिले में राणा प्रताप सागर बांध और कोटा के पास जवाहर सागर बांध ने इस क्षेत्र की बिजली की जरूरतों को सफलतापूर्वक पूरा किया है, जबकि कोटा बैराज तीन बांधों से पानी को डायवर्ट करता है।


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