अदृश्य जगत की अनंत शक्तियां

ब्रह्माण्ड में ईश्वर की अनन्त शक्तियां बिखरी हुई हैं, उनमें से जिन जीवनोपयोगी वस्तुओं की आवश्यकता होती है, उन्हें मनुष्य अपने प्रबल पुरुषार्थ द्वारा प्राप्त कर लेता है। बुद्धि बल और विज्ञान द्वारा प्रकृति की अनेक शक्तियों को मनुष्य ने अपने अधिकार में कर लिया है। विद्युत, ताप, प्रकाश, चुम्बक, अणु शक्ति जैसी प्रकृति की कितनी ही अदृश्य शक्तियों को मानव ने खोजकर अपने कल्याण के लिए प्रयोग किया है। विज्ञान के बारे में बात करें तो हजारों, लाखों लोगों में आइंस्टाइन, न्यूटन जैसे चंद लोगों ने प्रकृति की अनन्त उर्जा एवं सिद्धांतों को खोजकर मानव के सामने प्रस्तुत किया, इसी प्रकार हजारों, लाखों लोगों में से कुछ ही ऐसे दिव्य शक्ति सम्पन्न होते हैं जो अदृश्य जगत का अनुभव कर अन्य लोगों के लिए कल्याण का मार्ग प्रस्तुत करते हैं।

प्राचीन समय में अनेक ऋषि-महर्षियों ने अपनी साधना के बल पर ब्रह्माण्ड की असंख्य अदृश्य शक्तियों को जानकर मानव जाति के कल्याण हेतु उनकी आराधना एवं उपासना प्रारम्भ की थी। परब्रह्म की कुछ ऐसी चेतनात्मक शक्तियां हैं, जिन्हें आत्मिक प्रयासों द्वारा सिद्धि के रूप में प्राप्त किया जा सकता है। इन्हीं शक्तियों के द्वारा मनुष्य व्यापक ब्रह्म चेतना के महासमुद्र में से उपयोगी चैतन्य तत्वों को अपने कल्याण के लिए समाहित करता है। साधना की अभिलाषा विद्यमान हो तो फिर और कोई ऐसी कठिनाई शेष नहीं रह जाती जो नर को नारायण अथवा पुरुष को पुरुषोत्तम बनाने से वंचित रख सके। मन भागता है, जहां प्रिय वस्तु मिल जाती है, वहीं ठहर जाता है, कुरूप व्यक्ति पर मन आसक्त होने पर वह भी परम प्रिय हो जाता है, यही मन और मानव स्वभाव है। मन चाहता है हमेशा प्रिय लगने वाली वस्तु के आस-पास मंडराता रहे, मन को वश में करने की बहुत बड़ी अध्यात्मिक आवश्यकता भी साधना के माध्यम से पूरी हो जाती है। साधना, उपासना के लिए एक अनिवार्य सत्य यह है कि वह सच्चे भाव से चित्त लगाकर की जाए।

एक सच्चा भक्त किसी धार्मिक स्थल, मंदिर अथवा गुरू की शरण में जाकर विशेष सफलता एवं शांति जीवन में अनुभव कर फलने-फूलने लगता तो उसकी देखा-देखी दूसरे भी उसका अनुसरण करने लगते हैं लेकिन मन में शंका एवं उस स्थल पर पूर्ण रूप से समर्पित न होने के कारण वह उस लाभ का कभी अनुभव ही नहीं कर पाते जो बाकी व्यक्ति करते चले आए हैं। संसार में जीवन निर्वाह करते हुए एक साधारण मनुष्य को अनेक विघ्न-बाधाओं का सामना करना पड़ता है, विपरीत परिस्थितियों से होकर गुजरना पड़ता है जिसके कारण जीवन में अशांति, भय, क्रोध आदि के अवसर आते हैं। धन, संतान, वैभव, सम्मान, विद्या, बुद्धि आदि की प्राप्ति व्यक्ति अपनी योग्यता अनुसार कम या ज्यादा हासिल करता है। अयोग्य व्यक्ति मौका पाकर भी उसका लाभ लेने से वंचित रह जाता है जहां योग्य और कर्मठ व्यक्ति भाग्यवश प्राप्त अवसर का शत प्रतिशत उपयोग कर अपने जीवन को सफल बनाता है।

प्राचीन ग्रंथों में संतों, तपस्वियों एवं भक्तों के जिन चमत्कारों का वर्णन सुनते आए हैं, वे ईश्वर की सच्चे हृदय से उपासना करते थे और अपना सौ प्रतिशत मन, कर्म, वचन ईश्वर के चरणों में अर्पण करते थे जिसके लाभ ने उन्हें पृथ्वी पर अमर कर दिया। उपासना और साधना तो तभी सच्ची मानी जा सकती है, जब मनुष्य उस समय समस्त सांसारिक विषयों और आस-पास की बातों को भूलकर प्रभु के ध्यान में निमग्न हो जाए। जब मनुष्य इस प्रकार की संलग्नता और एकाग्रता में अपने इष्टदेव की उपासना करता है, तभी वह अध्यात्म मार्ग पर अग्रसर हो सकता है और तभी दैवी कृपा का लाभ प्राप्त कर सकता है। दृश्य जगत के साथ अदृश्य जगत के संकेत समझने वाला इस लोक तथा परलोक दोनों में परमगति प्राप्त करता है।

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