एक बार महर्षि भृगु और अन्य मुनियों ने सरस्वती नदी के तट पर मिलकर यज्ञ का आयोजन किया। इस यज्ञ में नारद जी भी आए हुए थे। नारद जी ने सभी ऋषियों से पूछा कि आप लोग इस यज्ञ का फल किस देव को देना चाहते हैं।
तब, इस पर ऋषियों का जवाब था, कि वह इस यज्ञ का फल तीनों देवों में सबसे श्रेष्ठ देव को ही देंगें। लेकिन, एक बहुत बड़ी समस्या यह थी कि ब्रम्हा, विष्णु और महेश में सबसे श्रेष्ठ कौन हैं? इसका निर्धारण कैसे किया जाए। इसका कोई निष्कर्ष न निकलता देख ऋषि – मुनियों ने त्रिदेवों की परीक्षा लेने का निश्चय किया और ब्रह्माजी के मानस पुत्र महर्षि भृगु को इस कार्य के लिए नियुक्त किया।
उन्होंने ब्रह्माजी को न तो प्रणाम किया और न ही उनकी स्तुति की। यह देख ब्रह्माजी क्रोधित हो गए। क्रोध की अधिकता से उनका मुख लाल हो गया। आंखों में अंगारे दहकने लगे, लेकिन फिर यह सोचकर कि ये उनके पुत्र हैं, उन्होंने हृदय में उठे क्रोध के आवेग को विवेक-बुद्धि से शांत कर लिया।
फ़िर, वहां से महर्षि भृगु कैलाश पर्वत गए। देवाधिदेव भगवान महादेव ने देखा कि भृगु आ रहे हैं, तो वे प्रसन्न होकर अपने आसन से उठे और उनका आलिंगन करने के लिए अपनी भुजाएं फैला दीं। किंतु, उनकी परीक्षा लेने के लिए भृगु मुनि उनका आलिंगन अस्वीकार करते हुए बोले -‘महादेव! आप सदा वेदों और धर्म की मर्यादा का उल्लंघन करते हैं। दुष्टों और पापियों को आप जो वरदान देते हैं, उनसे सृष्टि पर भयंकर संकट आ जाता है।

इसलिए मैं आपका आलिंगन कदापि स्वीकार नहीं करूंगा।” उनकी बात सुनकर भगवान शिव क्रोध से तिलमिला उठे। उन्होंने जैसे ही त्रिशूल उठा कर उन्हें मारना चाहा, वैसे ही भगवती ने बहुत अनुनय – विनय कर किसी प्रकार से उनका क्रोध शांत किया।
फ़िर, इसके बाद भृगु मुनि बिष्णु के लोक, वैकुण्ठ लोक गए। उस समय भगवान श्रीहरि देवी लक्ष्मी के साथ क्षीरसागर में विश्राम कर रहे थे।
भृगु ने जाते ही भगवान बिष्णु के छाती पर लात मारी। भक्त – वत्सल भगवान विष्णु शीघ्र ही अपने आसन से उठ खड़े हुए और उन्हें प्रणाम करके उनके चरण सहलाते हुए बोले – ‘भगवन्! आपके पांव में कहीं चोट तो नहीं लगी? कृपया इस आसन पर विश्राम कीजिए। भगवन! मुझे आपके शुभ आगमन का ज्ञान न था। इसलिए मैं आपका स्वागत नहीं कर सका। आपके चरणों का स्पर्श तीर्थों को पवित्र करने वाला है।
आपके चरणों के स्पर्श से आज मैं धन्य हो गया।” भगवान विष्णु का यह प्रेम-व्यवहार देखकर महर्षि भृगु की आंखों से अश्रु बहने लगे। उसके बाद वे ऋषि-मुनियों के पास लौट आए और ब्रह्माजी, शिवजी और श्रीहरि के यहां के सभी अनुभव विस्तार से कह बताए।

उनके अनुभव सुनकर सभी ऋषि- मुनि बड़े हैरान हुए और उनके सभी संदेह दूर हो गए। तभी से वे भगवान विष्णु को सर्वश्रेष्ठ मानकर उनकी पूजा-अर्चना करने लगे।