-रमेश दुबे भारत में आज जो इतिहास पढ़ाया जा रहा है उसमें कोई ढाई-तीन हजार वर्षों का इतिहास ही है और उसे भी विकृत करके पेश किया गया। यह यथार्थ से दूर है। इसके अलावा सनातन सभ्यता के आधार से शिक्षा पाठ्यक्रम को काट दिया गया। इतिहास लिखने का काम उन लोगों ने किया जो धर्म और संस्कृति को जीवन से खारिज करते हैं। यह उसी प्रकार है कि जैसे कुछ जवान बेटे अपने माता-पिता को वृद्धा अवस्था में खारिज कर देते हैं। जहां तक भारत के इतिहास का सवाल है इस पर गहन,शोध वैज्ञानिक दृष्टिकोण से होना चाहिए। वेदों,रामायण, महाभारत और पुराणों में भारत का पुरातन इतिहास दिया गया है। यह आगम-निगम,पुराण और श्रुति सम्मत हैं। हमारी प्राचीन गुरूकुल प्रणाली में सनातन विद्या धर्म शिक्षा और संस्कृति का पाठ पढ़ाया जाता था। आत्मरक्षा के और वीरता के गुर भी सिखाए जाते थे। मुस्लिम आक्रांताओं ने गुरूकुल प्रणाली को ध्वस्त कर दिया था। आजादी के बाद शिक्षा नीति में इसे स्थान नहीं दिया गया। 1952 में एनसीईआरटी की स्थापना भारत में शिक्षा के संकल्प को आगे बढ़ाने के लिए की गई थी। इस देश के बड़े संस्थान में ऐसे लोगों को रखा गया जो माक्र्सवादी और लेनिनवादी विचारों के पोषक थे। इनको मार्गदर्शन माक्र्सवादी विचारधारा से प्रेरित प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से मिल रहा था। जवाहरलाल नेहरू को भारत की सनातन संस्कृति और सभ्यता से उसकी विरासत से एलर्जी थी। उनके ऊपर तथाकथित धर्म निरपेक्षता का भूत सवार था। यह भूत उस समय विश्वव्यापी हो गया जब उन्होंने कुछ धर्मांध नेताओं के साथ मिलकर गुट निरपेक्ष आंदोलन का षडय़ंत्र रचा। इससे कुछ हासिल नहीं हुआ। विश्व स्तर पर नेता के रूप में स्थापित होने के लिए उन्होंने गुट निरपेक्ष आंदोलन का लोकलुभावना कान्सेप्ट गढ़ा। नेहरू जी को यह नहीं मालूम था कि धर्मनिरपेक्ष और गुटनिरपेक्ष होना धरती पर संभव नहीं हैं। सच यह है कि निरपेक्ष की अवधारणा सामान्य जीवन के लिए नहीं हैं इसका संबंध चरम सत्ता से हैं। निरपेक्षता निरकुंशवाद को जन्म देती हैं। आजादी के बाद भारतीय संस्कृति, इतिहास और धर्मग्रंथों को पाठ्यक्रम से हटाकर पश्चिमी या इस्लामी दृष्टिकोण को थोपने की कोशिश की गई। इससे हमारी कई पीढिय़ा सनातन सभ्यता के ज्ञान-विज्ञान और आध्यात्म विद्या की जड़ों से कट गई है। ब्रिटिश काल में थॉमस मैकाले ने भारतीय शिक्षा को इस तरह से बदला कि भारतीय अपनी संस्कृति को हीन समझें और अंग्रेजों को श्रेष्ठ मानें, इसमें भारतीय इतिहास और ज्ञान को दरकिनार किया गया। आजादी के बाद मौलाना अबुल कलाम आजाद और उनके उत्तराधिकारियों ने एक ऐसी शिक्षा व्यवस्था बनाई, जो हिंदू-विरोधी थी और इस्लामी आक्रमणों की क्रूरता को छिपाती थी, जिससे भारतीय अपनी संस्कृति से दूर हो गए। आर्यो को बाहरी बताकर गलत प्रचार किया गया। दरअसल सनातन का आधार वेद हैं। यह वेद आर्यो की तपस्या से प्रकाशित हुए। आजादी के बाद जो इतिहास लिखा गया वह उन इतिहासकारों ने लिखा जो माक्र्सवाद और लेनिनवाद से प्रभावित थे। इनका सनातन धर्म के अनुशासन से कोई लेना नहीं था। सनातन की महिमा का ज्ञान उन्हें दूर-दूर तक नहीं था। इन इतिहासकारों में इरफान हबीब (जन्म 1931) भारत के एक माक्र्सवादी और इस्लाम के अनुयायी विचार वाले इतिहासकार थे। प्राचीन और मध्यकालीन भारत के आर्थिक इतिहास पर उन्होंने एनसीईआरटी कीपुस्तकों में लिखा थे। मुगलकालीन कृषि व्यवस्था पर भी उन्होंने लिखा है। वह अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से लंबे समय तक जुड़े रहे। रोमिला थापर जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में एमेरिटस प्रोफेसर हैं। उन्होंने उन्होंने सनातन के इतिहास को बिना समझे बिना उस पर शोध किए इतिहास पर अपना लेखन किया। भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद के संस्थापक अध्यक्ष, आर.एस. शर्मा एक माक्र्सवादी थे। वह माक्र्स के विचारों से प्रभावित थे। विपिन चंद्रा माक्र्सवाद से प्रभावित भारतीय इतिहासकार थे। वे जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में प्रोफेसर रहे और गांधी-नेहरू युग के एक प्रमुख विद्वान माने जाते थे, जिन्होंने अपनी पुस्तकों और लेखों से भारतीय इतिहास लेखन किया। वेदों में प्रकृति की महिमा का गान-ऋग वेद में कहा गया है कि यह मार्ग शाश्वत हैं। इस मार्ग से सभी देवताओं और मनुष्यों का जन्म हुआ हैं। हे मनुष्यों अपने जन्म के आधार पर अपनी माता को नष्ट मत करों। पश्य देवस्य काव्यम् ना ममार न जीर्यते यह मंत्र अथर्ववेद (10.8.32) में कहा गया है। यह परमात्मा के काव्य (वेदों) की अमरता और शाश्वत प्रासंगिकता का वर्णन करता है। यह उपदेश देता है कि वेदों के माध्यम से ईश्वर को जाना जा सकता है जिससे मोक्ष प्राप्त होता है और व्यक्ति जरावस्था से मुक्त हो जाता है। मंत्र का अर्थ परमात्मा (ईश्वर) के काव्य (वेद) को देखो, जो न तो मरता है और न ही पुराना होता है। यहां प्रकृति और उसकी शक्तियों की महिमा की बात वेद कह रहे हैं। सृष्टि और ब्रम्हाण्ड में प्रकृति से परे कुछ नहीं हैं। सब कुछ उसी की सीमा में हैं। उसी की उपासना वेदों में बताई गई हैं। कार्लमाक्र्स को जानने वाले और स्वयं कार्लमाक्र्स ने कभी इस सनातन सत्र को जानने की कोशिश नहीं की। वेदों को गौतम बुद्ध ने भी माना-वेदों को तो गौतमबुद्ध ने भी खारिज नहीं किया था। उन्होंने कर्मकांडों को जो गलत आयाम दिया गया। उसका विरोध किया था। गौतमबुद्ध ने भी कोई ऐसा ज्ञान नहीं दिया जो वेदों से परे हों। यही बात महावीर स्वामी के बारे में भी सच समझना चाहिए। गौतम बुद्ध जहां-जहां गए वहां-वहां उन्होंने भगवान राम की अमर महिमा को देखा था। वेदों, रामायण, महाभारत और अन्य सनातन ग्रंथों को काल्पनिक कहानियों में बदलकर या पाठ्यक्रम से हटाकर, इतिहास को अशोक से शुरू करके या केवल आक्रमणकारियों का महिमामंडन करके प्रस्तुत किया गया। क्या आप जानते है हमारे सनातन धर्म शिक्षित होना जरूरी है सनातन धर्म की शिक्षा समग्र रूप से व्यक्ति को एक नैतिक, धार्मिक और आध्यात्मिक मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है, जिसमें आत्म-विकास और समाज के कल्याण के बीच संतुलन बनाए रखा जाता है। यह मुख्य रूप से जीवन के सार्वभौमिक सिद्धांतों और नैतिक मूल्यों पर आधारित है, जो मानवता के कल्याण और समस्त सृष्टि के साथ सामंजस्य स्थापित करने पर जोर देती है। सनातन धर्म में धर्म का अर्थ नैतिक कर्तव्यों, सत्य, और न्याय से जुड़ा है। व्यक्ति का उद्देश्य अपने जीवन में सत्य और धर्म का पालन करना है, जिससे समाज और व्यक्तिगत जीवन में संतुलन बना रहे। सत्य को सर्वोच्च मूल्य माना गया है। सत्यमेव जयते का अर्थ है सत्य की ही जीत होती है। सत्य के मार्ग पर चलना और अपने विचारों, शब्दों, और कार्यों में सच्चाई को अपनाना सनातन धर्म की बुनियादी शिक्षा है। अहिंसा यानी किसी भी प्राणी को शारीरिक, मानसिक या भावनात्मक कष्ट न पहुंचाना। वसुधैव कुटुंबकम की विचारधारा संपूर्ण विश्व को एक परिवार मानती है। इसका अर्थ है कि सभी मनुष्यों, जीवों, और प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व और एकता का भाव रखना। कर्म का सिद्धांत कहता है कि व्यक्ति को अपने कर्तव्यों का पालन बिना किसी फल की अपेक्षा के करना चाहिए। जैसा कर्म करेंगे, वैसा फल मिलेगा। यह जीवन की नैतिकता और कर्म के परिणामों के बारे में शिक्षा देता है। सनातन धर्म में संसार को अस्थायी और क्षणभंगुर माना गया है। इसे माया कहा गया है, और व्यक्ति को इससे मोहित होकर अपने वास्तविक उद्देश्य को भूलने की सलाह दी जाती है। आत्मा (जीवात्मा) अमर है और परमात्मा (ईश्वर) का अंश है। मनुष्य का अंतिम उद्देश्य आत्म-साक्षात्कार करना और परमात्मा से मिलन की अवस्था प्राप्त करना है। मन और शरीर को संयमित और शुद्ध करने के लिए योग और ध्यान का विशेष महत्व है। यह आत्मिक विकास और मानसिक शांति के साधन हैं। सनातन धर्म पुनर्जन्म और मोक्ष में विश्वास करता है। व्यक्ति के कर्मों के आधार पर उसका पुनर्जन्म होता है, और मोक्ष उस अवस्था को कहते हैं जब आत्मा जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाती है। सभी जीवों और प्रकृति के साथ संतुलन और सामंजस्य बनाए रखना सनातन धर्म की एक महत्वपूर्ण शिक्षा है। प्रकृति का सम्मान और उसकी रक्षा करना धर्म का हिस्सा है। वेदों में जीवन का ऐसा कोई क्षेत्र नहीं हैं जिसके बारे में मार्ग न बताया गया हो। सृष्टि और ब्रम्हांड के बड़े-बड़े रहस्य वेदों में उजागर किए गए हैं। ज्ञान, विज्ञान, गणित, शिल्प आयुर्वेद, गवायुर्वेद, वृक्षायुर्वेद, धनुर्वेद, भूगोल, खगोल, ब्रह्माण्ड विज्ञान, अन्तरिक्ष विज्ञान, यान्त्रिकी, भाषाशास्त्र, छन्दशास्त्र, व्याकरण, दर्शन, अनुभूति, कर्म फल मिमान्सा,मनोवैज्ञानिक, मनोविश्लेषण, सामाजिक व्यवहार, व्यापार, वाणिज्य, राजनीति, शासन, प्रशासन कला, ललित कलाएँ क्या नहीं है वेदों में। -जारी