दोस्तो मीराबाई का विवाह सन् 1516 ई. मे मेवाड़ के महाराणा सांगा के ज्येष्ठ पुत्र भोजराज सिंह से हुआ था। विवाह के एक से दो साल बाद सन् 1518 ई. मे भोजराज को दिल्ली सल्तनत के खिलाफ युद्ध मे जाना पडा। सन् 1521 ई. मे महाराणा सांगा व मुगल शासक बाबर के बीच युद्ध हुआ। इस युद्ध मे महाराणा सांगा की हार हुई जिसे खानवा के युद्ध के नाम से जाना जाता है। इस युद्ध मे महाराणा सांगा तथा उनके ज्येष्ठ पुत्र भोजराज सिंह की मृत्यु हो गई।
मीराबाई अपने पति भोजराज सिंह के मृत्यु के पश्चात अकेली पड गई। उसके बाद मीराबाई भगवान श्री कृष्ण की भक्ति मे पूरी तरह से डूब गई। मीराबाई साधू संतो के साथ उठने बैठने लगी तथा भजन भी करने लगी। मीराबाई के देवर विक्रमादित्य को यह सब पसंद नही आया उन्होंने मीराबाई को समझाया कि हम सब राजपूत लोग है और यह सब कार्य हमारा नही है परंतु मीराबाई ने उनकी एक न सुनी और कृष्ण भक्ति मे लगी रही। विक्रमादित्य ने मीराबाई को कृष्ण भक्ति से रोकने के बहुत प्रयास किये लेकिन वह असफल रहा।
विक्रमादित्य ने मीराबाई को जान से मारने की कोशिश की उसने मीराबाई को जहर देने तथा सर्प से कटवाने का भी प्रयास किया। मान्यताओं के अनुसार विक्रमादित्य का भेजा गया सांप फूलो की माला बन गया फलस्वरूप विक्रमादित्य मीराबाई को मारने मे असफल रहा। उसके बाद मीराबाई ने मेवाड छोड दिया तथा भगवान श्री कृष्ण को ही अपना सबकुछ मान लिया। इन्होंने अपना शेष जीवन श्री कृष्ण की भक्ति मे बिताया। मीराबाई श्री कृष्ण की भक्ति मे इतनी डूब जाती थी कि बिना कुछ खाये पिये घंटो तक भगवान श्री कृष्ण की भक्ति मे लीन रहती थी।
दोस्तो मेवाड़ भूमि को छोडने के बाद मीराबाई ने अपने आपको पूरी तरह से श्री कृष्ण की भक्ति मे समर्पित कर दिया। मीराबाई अपने जीवन के अंतिम वर्षो मे द्वारिका मे रहती थी। सन् 1547 ई. मे गुजरात के डाकोर स्थित रणछोड़ दास मंदिर मे मीराबाई चली गई और वही पर विलीन हो गई। ऐसा कहा जाता है कि सन् 1547 ई. मे ही वही रणछोड़ दास मंदिर मे मीराबाई की मृत्यु हो गई।