
बर्बरीक ने माँ दुर्गा की कई वर्षों तक कठोर तपस्या की। जिसके फलस्वरूप माँ दुर्गा बर्बरीक की तपस्या से प्रसन्न हुई। माता ने बर्बरीक से कहा कि हे बर्बरीक मै तुम्हारी तपस्या से अति प्रसन्न हूँ अतः जो तुम्हें वरदान चाहिये वो हमसे माँग लो। बर्बरीक ने माँ दुर्गा से कहा कि हे माता मुझे ऐसा अजेय अस्त्र दीजिये जो न तो पहले कभी किसी ने पाया था
और न ही मेरे बाद कोई पायेगा। तब माँ दुर्गा ने बर्बरीक को तथास्तु कहा और वरदान स्वरूप बर्बरीक को तीन बाण प्रदान किये। दोस्तो ये बाण इतने शक्तिशाली थे कि यदि बर्बरीक महाभारत के युद्ध मे शामिल हो जाता तो कुछ क्षणो मे ही महाभारत का पूरा युद्ध समाप्त हो जाता। जिसमे कौरव और पाण्डव दोनो मारे जाते और अंत मे सिर्फ बर्बरीक ही विजयी होता।
माँ दुर्गा से वरदान प्राप्त करने के बाद बर्बरीक अपनी माँ से मिलने आया और कहा कि माँ मुझे माँ दुर्गा ने वरदानस्वरूप ये तीन बाण प्रदान किये है। इन बाणों का सामना कोई भी योद्धा नही कर सकता है और अब मै महाभारत के युद्ध मे शामिल होने जा रहा हूँ। बर्बरीक की माँ मौरवी ने बर्बरीक से कहा कि मुझे एक वचन दो कि कौरव और पाण्डव दोनो मे से जो सेना कमजोर होगी तुम उसी की तरह से युद्ध लडोगे। इस पर बर्बरीक ने अपनी माँ को यह वचन दिया कि मेरे नजर मे जो कमजोर होगा मै उसी की तरफ से युद्ध लडूंगा।
यह कहकर घोडे पर सवार होकर बर्बरीक युद्ध मे शामिल होने के लिये निकल पडा। उधर भगवान श्री कृष्ण ने एक ब्राम्हण का वेश धारण करके बर्बरीक के समक्ष आ गये और बर्बरीक से कहने लगे कि हे वीर योद्धा कहाँ जा रहे हो? तब बर्बरीक ने श्री कृष्ण से कहा कि मै महाभारत के युद्ध मे शामिल होने जा रहा हूँ। तब बर्बरीक ने उस ब्राम्हण को माँ दुर्गा से प्राप्त दीव्य बाणो के बारे मे बताने लगा। उस ब्राम्हण से सोचा कि चलो इसकी परीक्षा ले लेते है। तब उस ब्राम्हण ने बर्बरीक से कहा कि यदि ऐसी बात है तो ये सामने एक पीपल का पेड है तुम इस पेड के प्रत्येक पत्ते को अपने बाण से भेद के दिखाओ।
बर्बरीक ने अपना बाण चलाया वह बाण उस पीपल के पेड के सभी पत्तों को भेदकर उस ब्राम्हण के पैर के चारो चरफ घूमने लगा क्योंकि उस ब्राम्हण ने पीपल के एक पत्ते को अपने पैर के नीचे दबा रखा था। इस पर उस ब्राम्हण ने सोचा कि यदि बर्बरीक महाभारत के युद्ध मे शामिल हुआ तो यह युद्ध कुछ ही क्षणो मे समाप्त हो जायेगा जिसमे कौरव और पाण्डव दोनो मारे जायेंगे इस युद्ध मे सिर्फ बर्बरीक ही विजयी होगा। मुझे इसे महाभारत के युद्ध मे शामिल होने से रोकना चाहिये। ऐसा सोचकर उस ब्राम्हण ने बर्बरीक से कहा कि
हे योद्धा मै तुमसे दानस्वरूप कुछ मांगना चाहता हूँ क्या तुम मुझे दे सकोगे? तब बर्बरीक ने उस ब्राम्हण से कहा कि हे ब्राम्हण देवता मै आपको वचन देता हूँ कि आप मुझसे दानस्वरूप जो कुछ मागेंगे मै आपको दे दूँगा। तब उस ब्राम्हण ने दक्षिणा मे बर्बरीक का सिर मांग लिया तब बर्बरीक ने उस ब्राम्हण से कहा कि आप कोई साधारण इंसान नही है आप सच-सच बताइये कि आप कौन है? तब वह ब्राम्हण अपने असली रूप मे आया जो कि भगवान श्री कृष्ण थे। बर्बरीक ने श्री कृष्ण को कहा कि मै आपको सिर दे दूँगा लेकिन मुझे दो वरदान चाहिये तब श्री कृष्ण ने कहा
कि हे दानवीर माँगो तुम्हें क्या वरदान चाहिये? तब उसने कहा कि हमारे शरीर का अंतिम संस्कार आपके ही हाथो होना चाहिये और दूसरा वरदान ये कि मै इस पूरे महाभारत युद्ध को देखना चाहता हूँ। तब भगवान श्री कृष्ण ने बर्बरीक को वरदान दे दिया और कहा कि हे बर्बरीक तुम्हें खाटूश्याम के नाम से जाना जायेगा जो हमारा ही नाम होगा कलियुग मे भी लोग तुम्हें पूजेंगे। इतना वरदान पाकर बर्बरीक ने अपना सिर काटकर भगवान
महाभारत के युद्ध मे कौरवों की सेना मारी गई तथा पाण्डवों की जीत हुई। इस पर पाँचों पाण्डव अपने-अपने को श्रेष्ठ बताने लगे कि हमारी वजह से ही महाभारत का युद्ध हम जीत पाये है। तब भगवान श्री कृष्ण ने कहा कि तुम लोग आपस मे बहस मत करो एक वीर योद्धा ऐसा भी है जिसने इस पूरे महाभारत के युद्ध को अपनी आँखों से देखा है चलो उसी से पूछ लेते है कि इस महाभारत के युद्ध को जीताने मे किसका योगदान रहा है? तब भगवान श्री कृष्ण पाँचों पाण्डवों को लेकर बर्बरीक के पास पहुचे और कहने लगे कि हे बर्बरीक तुमने महाभारत युद्ध को अपनी आँखों से देखा है।
अतः तुम्ही बताओ कि पाण्डवों को जिताने मे तथा कौरवों का सर्वनाश करके मे किसका योगदान रहा है? तब बर्बरीक ने पाँचो पाण्डवों से कहा कि हे पाण्डव इस पूरे महाभारत युद्ध मे सिर्फ भगवान श्री कृष्ण का ही हाथ रहा है। मैने पूरे युद्ध मे सिर्फ इनका सुदर्शन चक्र ही घूमते हुये देखा है जिसकी वजह से आप लोग जीते है। अतः आप लोगो को जिताने का श्रेय भगवान श्री कृष्ण को ही जाता है इनके बिना आप लोग महाभारत का युद्ध नही जीत सकते थे। इससे पाँचो पाण्डवों को अपनी भूल का एहसास हो गया और सभी ने मिलकर भगवान श्री कृष्ण से अपनी गलती की क्षमा माँगी।