हिंदू धर्म में सुहागिन महिलाओं को साल भर जिस व्रत का इंतजार होता है वह अब आ चुका है। 1 नवंबर को सुहागिन महिलाएं पति की दीर्घायु के लिए करवा चौथ का व्रत रखेंगी। दिन भर भूखी-प्यासी रहने के बाद शाम को संज-संवरकर चांद का दीदार करने के बाद छलनी से पति का चेहरा देखने के बाद चांद को अर्घ्य देकर व्रत तोड़ेंगी। करवा चौथ के व्रत में सुबह के वक्त यानी सूर्योदय से पहले सरगी खाने की परंपरा है।
सरगी में प्रमुख तौर पर खाने-पीने की चीजों को ही शामिल किया जाता है। सरगी सूर्योदय से पहले सास अपनी बहू को खाने के लिए देती हैं। इसमें मिठाई, फल और मेवा रखी जाती हैं। आजकल सास सरगी में अपनी बहु को कपड़े भी भेंट के तौर पर देती हैं। बहुएं सरगी को बुजु्र्गों के प्रसाद के रूप में ग्रहण करने के बाद ही व्रत की शुरुआत करती है। इसे किसी भी स्थिति में सूर्योदय से पहले ही खाना होता है। सरगी को खाने का यह लाभ होता है कि महिलाओं को दिन भर भूखे-प्यासे रहने के लिए आवश्यक ऊर्जा मिल जाती है।
सूर्योदय से पहले सास अपनी बहु को सरगी देती हैं और शाम को बहुएं भी अपनी सास को बायना देती हैं। इस बायना में भी खाने की चीजों के साथ सास के लिए साड़ी रखी जाती है। इसके साथ ही वस्त्र और श्रृंगार का सामान भी दिया जाता है।
सरगी की थाली में फलों का विशेष महत्व होता है। माना जाता है कि फलों की मिठास के जरिए सास अपनी बहू को उसके जीवन में मिठास बने रहने का आशीर्वाद देती है। फलों में पानी की भरपूर मात्रा होने की वजह से ये आपके शरीर में पानी की कमी नहीं होने देते। मिठाइयों के बिना हमारे सभी त्योहार अधूरे माने जाते हैं। इसलिए सरगी की थाली में मिठाइयां रखना बेहद शुभ माना जाता है। वहीं सरगी की थाली में मेवे शरीर में कमजोरी नहीं आने देते और व्रत पूर्ण होने के बाद भी महिलाओं को पुष्ट बनाए रखते हैं।