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एकमात्र जगह जहां शक्तिपीठ और ज्योतिर्लिंग एक साथ दशमी की सुबह तक बंद रहेगा मंदिर

Updated on 01-01-1970 12:00 AM

आज (20 अक्टूबर) नवरात्रि का छठा दिन है। शक्तिपीठों की यात्रा के छठे पड़ाव पर हम आए हैं देवघर (झारखंड) की जय दुर्गा शक्तिपीठ। इसे हृदयपीठ भी कहते हैं, क्योंकि यहां देवी सती का हृदय गिरा था। इस शक्तिपीठ के साथ ही बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग भी स्थित है। ये मंदिर राजधानी रांची से करीब 250 किमी दूर स्थित है।

ये एकमात्र ऐसा मंदिर है, जहां शक्तिपीठ के साथ ही ज्योतिर्लिंग भी है, एक ही मंदिर में इन दोनों की पूजा होती है। माना जाता है कि शिव जी के साथ ही शक्ति का पूजा स्थल होने से यहां की गई पूजा-पाठ का फल बहुत जल्दी मिलता है।

जानिए आज अभी तक मंदिर में क्या-क्या हुआ...

सुबह 4 बजे : मंदिर के कपाट खुले। कांचा जल से शिव-शक्ति का अभिषेक किया गया। विशेष पूजा हुई। इस पूजा में सिर्फ मंदिर के पुजारी शामिल होते हैं।

सुबह 6 बजे : विशेष पूजा के बाद मंदिर सुबह करीब 6 बजे भक्तों के लिए खुला। भक्त दर्शन करने के साथ ही भगवान को जल चढ़ा रहे हैं।

सुबह 8 बजे : आज मंदिर में भक्तों की सामान्य भीड़ है। लोगों की कतार लगातार चल रही है, इसके चलते दर्शन करने में ज्यादा समय नहीं लग रहा है। इस परिसर में कुल 22 मंदिर हैं। सिर्फ बैद्यनाथ मंदिर में थोड़े भक्त हैं, बाकी मंदिरों में बहुत कम भक्त दिखाई दे रहे हैं।

सुबह 11 बजे : अब शाम 4 बजे बेल निमंत्रण पूजा होगी। तब तक मंदिर में भक्त अभिषेक और अन्य पूजन कर्म कर पाएंगे।

दोपहर 3.30 बजे : मंदिर में भक्त शिव-शक्ति के दर्शन कर रहे हैं। इस दौरान हमने मंदिर के एक पुजारी से बात की। पुजारी ने बताया है कि ​​​​​आज शाम 7 बजे मंदिर में अंतिम पूजा होगी। रात 9 बजे मंदिर के कपाट दर्शनार्थियों के लिए बंद हो जाएंगे। इसके बाद आम लोगों के लिए मंदिर दशमी पर खुलेगा। सप्तमी, अष्टमी और नवमी तिथि पर सिर्फ मंदिर के पुजारी पूजा-पाठ करेंगे।

दोपहर 4.10 बजे : मंदिर में बेल निमंत्रण पूजा शुरू हो गई है। इस पूजा में मां को निमंत्रित किया जाता है। ये पूजा दो घंटे की होती है। कल सुबह फिर यहां विशेष पूजा होगी।

शाम 5.20 बजे : पार्वती माता मंदिर के कपाट अभी बंद है। मंदिर करीब 6 बजे खुलेगा। इसके बाद मां का शृंगार किया जाएगा, फिर आरती होगी। आरती के बाद इस मंदिर के कपाट फिर से बंद कर दिए जाएंगे।

शाम 5.40 बजे : पार्वती मंदिर में 6 बजे होने वाली आरती की तैयारियां शुरू हो गई हैं।

शाम 6.20 बजे : बेल पूजा खत्म हो गई है। अब कुछ देर बाद महाआरती है।

शाम 7.40 बजे : मंदिर में महाआरती शुरू हो गई है। आरती के कुछ देर बाद मंदिर के कपाट बंद कर दिए गए। अब दशमी की सुबह देवी मंदिर के कपाट खुलेंगे। तब तक मंदिर के पुजारी पूजा करेंगे। आम भक्तों के लिए मंदिर बंद रहेगा।

जिस जगह पर देवी सती का हृदय गिरा था, उसी जगह पर बाबा बैद्यनाथ की स्थापना की गई है। मंदिर के पास स्थित श्मशान को महाश्मशान कहते हैं। शक्तिपीठ, ज्योतिर्लिंग और श्मशान पास-पास होने से ये जगह तंत्र साधकों के लिए बहुत खास है। यहां मां काली के प्रसिद्ध उपासक बामा खेपा सहित कई बड़े तांत्रिकों ने साधना की है। इस शक्तिपीठ को भैरव का स्थान भी माना जाता है।

नवरात्रि में सप्तमी से नवमी की रात तक बंद रहेगा मंदिर

बैद्यनाथ मंदिर की इस शक्तिपीठ में अश्विन माह की नवरात्रि की षष्ठी की शाम से मंदिर के कपाट दशमी की सुबह तक बंद रहते हैं। इस दौरान मां की मूर्ति को कपड़ों से ढंका जाता है। मां की पूजा भी नहीं की जाती है। एक परात में एक आईना रखकर मां की छाया को हार-फूल आदि चीजें अर्पित की जाती हैं। ये पद्धति महाकाल संहिता, अघोर तंत्र में बताई गई है। भक्तों के लिए मंदिर के कपाट नवरात्रि के बाद दशमी तिथि पर खोले जाते हैं।

सतयुग से स्थापित है जय दुर्गा शक्तिपीठ

यहां शक्तिपीठ सतयुग से स्थापित है, जबकि बाबा बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग त्रेता युग में स्थापित हुआ। रामायण के समय रावण शिवलिंग लंका ले जा रहा था, उस समय उसने शिवलिंग को देवघर क्षेत्र में नीचे रख दिया था, इसके बाद शिवलिंग यहीं स्थापित हो गया। यहां की गई पूजा से शिव-शक्ति की भक्ति एक साथ हो जाती है। नवरात्रि में तंत्र साधना के लिए यहां दूर-दूर से लोग आते हैं।

हर साल सावन में दूर-दूर से भक्त बाबा बैद्यनाथ को जल चढ़ाने आते हैं, ठीक इसी तरह नवरात्रि में भी देवी भक्त दूर-दूर से यहां पहुंचते हैं।

इस क्षेत्र का एक नाम चिता भूमि भी है

जब यहां सती का हृदय गिरा था, तब सभी देवताओं ने विधि-विधान से देवी के हृदय का अंतिम संस्कार किया था। आज भी यहां गहरी खुदाई करने पर राख निकलती है। इस मान्यता की वजह से ही इसे चिता भूमि भी कहा जाता है।

नवरात्रि में नौ दिन नहीं, दस दिन होती है विशेष पूजा

मंदिर के पुजारी पंडित दुर्लभ मिश्र कहते हैं, ''इस शक्तिपीठ में नवरात्रि नौ नहीं, दस दिन की होती है। नवरात्रि की प्रतिपदा से मंदिर में तांत्रिक विधि से पूजा शुरू होती है। अष्टमी तिथि पर संधि पूजा होती है। नवमी की पूजा में बलि छेद होता है। दशमी को जयंती बलि की पूजा होती है।

सिद्धपीठ को ही शक्तिपीठ कहा जाता है। शक्ति के बिना कोई सिद्धि नहीं मिलती है। बैद्यनाथ मंदिर पहले आदिशक्ति का स्थान है। सिद्धपीठ होने की वजह से यहां सतयुग से ही कई बड़े-बड़े ऋषियों ने तप किया है। पहले नाथ संप्रदाय इस मंदिर का रक्षक था। नाथ संप्रदाय ने यहां मुगलों को प्रवेश नहीं करने दिया था। नाथ संप्रदाय की वजह से इस जगह का नाम बैद्यनाथ पड़ा। यहां तांत्रिक विधि से पूजा खास तौर पर होती है।''

 

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