समुद्र मंथन का आठवां रत्न लक्ष्मी, कैसे सागर से निकलीं और क्यों विष्णु को वर चुना

सबसे पहली मान्यता धरती पर लक्ष्मी के प्रकट होने की है। मार्कंडेय पुराण कहता है कार्तिक अमावस्या की रात में जब चारों ओर अंधेरा था, तब एक देवी कमल के फूल पर बैठी प्रकट हुईं, उनके आते ही चारों ओर उजाला हो गया। ये देवी लक्ष्मी थीं।

श्रीमद् भागवत पुराण कहता है समुद्र मंथन से आठवें रत्न के रूप में लक्ष्मी समुद्र से प्रकट हुईं। वो दिन भी कार्तिक अमावस्या का था, समुद्र से प्रकट होकर उसी दिन लक्ष्मी ने भगवान विष्णु को पति के रूप में चुन लिया। दोनों का विवाह हो गया।

लक्ष्मी के प्रकट होने से भगवान महावीर के महानिर्वाण तक दीपावली को लेकर कई कहानियां हैं। आज दीपावली पर लक्ष्मी के प्रकट होने का व्यावहारिक पक्ष समझते हैं।

सबसे पहले वो 7 कारण, जिनके लिए हम दीपावली का उत्सव मनाते हैं….

  1. इस दिन समुद्र मंथन से लक्ष्मी प्रकट हुई थीं।
  2. देवी दुर्गा ने मां काली का रूप लेकर राक्षसों का संहार किया।
  3. वामन ने बलि से तीन पग भूमि मांगी और तीन कदम से तीनों लोक नाप लिए।
  4. भगवान राम वनवास से लौटकर अयोध्या आए।
  5. भगवान कृष्ण ने नरकासुर को मार कर 16,100 महिलाओं को उसकी कैद से छुड़ाया।
  6. महाभारत के युधिष्ठिर का राजसूय यज्ञ और इंद्रप्रस्थ की स्थापना हुई।
  7. भगवान महावीर को महानिर्वाण की प्राप्ति हुई।

लक्ष्मी के प्रकट होने और उसमें छिपे अर्थ

आज के युवाओं को ये कहानी थोड़ी इम्प्रैक्टिकल लग सकती है। कैसे पहाड़ की मथनी और सांप को रस्सी बनाकर समुद्र को मथा जा सकता है। वास्तव में इसके पीछे के अर्थ बहुत गहरे हैं। इसे ऐसे समझिए कि हमारा मन एक समुद्र है, अगर इसका मंथन करना हो तो क्या करना होगा। सबसे पहले अपने ईगो यानी अहंकार को मथनी बनाना होगा, अहंकार का ही एक नाम मद है और मदरांचल मतलब अहंकार का पहाड़।

अब सर्प की मथनी। वास्तव में ये हमारी कुंडलिनी है। आपने अक्सर मेडिकल साइन के रूप में रीढ़ की हड्डी से लिपटे सांप देखे होंगे। ये हमारी कुंडलिनी के प्रतीक हैं। कुंडलिनी जुड़ी है हमारे मेडिटेशन से। मन का मंथन मेडिटेशन से ही होता है। मेडिटेशन के लिए जरूरी है अपने ईगो को बांधें। जब तक ईगो रहेगा, मन को मथना संभव नहीं।

हम जब भी ध्यान लगाते हैं, तो सबसे पहले हमारे मन में बुरे ख्याल ही आने शुरू होते हैं। अगर इन विचारों पर कंट्रोल ना किया जाए तो हम इन्हीं के साथ बहते जाते हैं। ये ही कालकूट विष है। शिव का विष पीना इस बात का संकेत है कि जब भी ऐसे विचार आएं, इन्हें अपने गुरुओं और वरिष्ठों से साझा करें, ना कि खुद अपने मन में दबाए बैठे रहें। शिव आदिगुरु माने गए हैं, इसलिए कालकूट विष उनके हिस्से में आया। जो गुरु है वो बुरे विचारों का निवारण करता है, उन्हें आगे बढ़ने से रोकता है।


इसका अर्थ है, पहले बुरे और बेमतलब के विचार मंथन से निकले। उसके बाद ऐरावत हाथी यानी सफेद रंग का हाथी निकला। हाथी धैर्य और शांति का प्रतीक है। कामधेनु गाय हमारी रचनात्मकता का प्रतीक है, उससे जो मांगों वो देती है। उच्चैश्रवा घोड़ा जिसके सात सिर हैं, ये हमारे विचारों और दृष्टिकोण का प्रतीक है। कल्पवृक्ष हमारे मन की स्थिति है, जिसके नीचे बैठकर कल्पना करने से ही काम सिद्ध हो सकें। रंभा सुंदरता और बुद्धि का मेल है। जिसने विश्वामित्र की तपस्या भंग कर दी थी। जब ये सारे गुण हमारे भीतर आ जाएं तो जीवन में लक्ष्मी का आगमन होता है।

इसके पीछे बड़ा रहस्य है। वास्तव में लक्ष्मी का ये स्वरूप हमें सिखाता है कि हमारे जीवन में लक्ष्मी कैसी आए। लक्ष्मी कमल के फूल पर विराजित होती हैं, कमल ऐसा फूल है जिस पर पानी की बूंदे भी नहीं ठहरतीं। ये कीचड़ में रहकर भी अपनी सुंदरता नहीं खोता। हमारा कमाया धन ऐसा ही होना चाहिए, ना उस पर दुनिया की बुरी चीजों का प्रभाव हो, ना वो किसी गलत तरीके से कमाया गया हो।

लक्ष्मी के सफेद कपड़े बताते हैं कि वो बेदाग यानी ईमानदारी से कमाई हुई होनी चाहिए। लक्ष्मी आठवां रत्न हैं और ज्योतिष में आठ शनि का अंक है। शनि श्रम और न्याय का देवता है, वो ना आलस पसंद करता है और ना अन्याय। आठवें नंबर पर समुद्र से निकली लक्ष्मी कहती हैं वो उन्हीं के जीवन में आती हैं जो परिश्रम करते हैं, न्याय के साथ जीते हैं।

कहते हैं तीन प्रमुख देवताओं में ब्रह्मा सृष्टि के पिता हैं, क्योंकि उन्होंने इसकी रचना की। विष्णु इसके पालक हैं और शिव के पास संहार का अधिकार है। विष्णु पालक हैं, वो सृष्टि का संचालन करते हैं क्योंकि वो गृहस्थों के देवता हैं। लक्ष्मी गृहस्थों की देवी हैं। लक्ष्मी उन्हीं का चयन करती हैं, जो परिवार और समाज को महत्व देते हैं। लक्ष्मी को रिश्ते भी पसंद हैं और परिवार भी। जहां ये दोनों नहीं होते, वहां लक्ष्मी होकर भी नहीं होतीं।



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