भक्त प्रह्लाद के पोते और राजा विरोचन के पुत्र थे महाराज बलि। राजा विरोचन की पत्नी सुरोचना ने महाराज बलि को जन्म दिया था। विरोचन के बाद महाराज बलि ही दैत्यों के अधिपति हुए और उन्हे दैत्यराज बलि भी कहते हैं। एक बार की बात है, तब समुद्र मंथन के बाद देवगन बहुत शक्तिशाली हो गये थे। तब देवासुर (देव–असुर) संग्राम हुए। उस संग्राम में देवताओं द्वारा महाराज बलि और उनकी दैत्यों और असुरों वाली सेना का भी नाश हो गया। उस युद्ध में इंद्र के वज्र द्वारा इनकी मृत्यु निश्चित हो गई थी। तब शुक्राचार्य जो की दैत्यगुरू थे, उन्होंने अपनी संजीवनी विद्दा के द्वारा महाराज बलि के प्राण बचाये।
अपने होश और प्राण शक्ति सँभालने के बाद दैत्यराज बलि ने गुरु शुक्राचार्य से पूछा “आचार्य मैं अपना राज्य, अपनी सेना और शक्ति वापस कैसे पा सकता हूँ?” तब इसके उत्तर में आचर्य ने कहा ” हे पुत्र! तुम महाभिषेक विश्वजीत यज्ञ करो इससे तुम्हे तुम्हारा हारा हुआ राज्य, अपनी सेना और शक्ति सभी पुनः प्राप्त हो जायेंगे। आचार्य की बातें सुन कर बलि यज्ञ करने को तैयार होगए। आचार्य की देख रेख में यज्ञ आरम्भ हुआ। इस यज्ञ में अग्निदेव ने प्रकट होकर महाराज बलि को सोने का दिव्य रथ दिया जिसमे चार घोड़े बंधे थे। वह रथ हवा की गति में दौड़ने की क्षमता रखता था। साथ ही साथ यज्ञ से बलि को दिव्य धनुष, बाणों से भरा तरकश और अभेद्द कवच प्राप्त हुआ। इसके साथ गुरु शुक्राचार्य ने बलि को भयंकर गर्जना करने वाला शंख और कभी न मुरझाने वाले पुष्पों की माला प्रदान की।
अपने यज्ञ को पूर्ण कर महाराज बलि महाशक्तिशाली बन गए। और एक बार फिर से देवासुर संग्राम का आह्वाहन किया। इस संग्राम मे देवता बुरी तरह पराजित हुए। केवल इतना ही नहीं अपितु देवराज इंद्र को युद्धस्थल छोड़ कर भागना पड़ा। दैत्यराज बलि यह संग्राम जीत कर स्वर्ग के राजा बन गए। अपनी विजय और बल का अहंकार भी उनके अंदर जन्म लेने लगा जो की पिछले हार के साथ सुप्त (सो) हो गया था।
महाराज बलि का घमण्ड तो चूर हो हि गया था और प्रभु के सामने वो शरणागत हो चुके थे। परन्तु श्री हरी तो भक्तवत्सल हैं, अपने भक्त की भक्ति में बंध जाते हैं। बलि की भक्ति से प्रसन्न होकर श्री हरी ने उन्हें अपने वास्तविक रूप में दर्शन दिया और कहा आज से तुम पाताल लोक के स्वामी हो। यह सातवें मन्वन्तर की बात है। आठवें यानि सावार्णि मन्वन्तर में महाराज बलि को अपनी भक्ति के उपहार इन्द्र का पद मिला। यानि उस मन्वन्तर के लिए देवताओं के राजा इंद्र बलि ही हुए ।