एक बार नरसी जी की दादी एक संत के पास गई वो संत आँख मूदकर ध्यान मग्न थे अब नरसी जी की दादी संत को बार-बार ध्यान से जगाती और कहती कि बाबा जी हमारे छोरे को आर्शीवाद दे दो लेकिन बाबा तो ध्यान मे ही लगे रहे। दादी के बडे प्रयास और विनती के बाद उस संत ने अपनी आँख खोली और कहने लगे कि क्या हुआ बूढी माई हमे भगवान का ध्यान क्यो नही करने दे रही हो? तब नरसी जी की दादी ने कहा कि हे बाबा आप तो भगवान के बहुत बडे भक्त हो इसे आर्शीवाद दे दो ताकि यह छोरा देखने और बोलने लग जाये। वह संत बोले कि आजा बेटा।
नरसी जी उस संत के पास जाकर बैठ गये संत ने नरसी जी के आँख और मुह पर अपने हाथ को फेरा और उनके कान मे फूंक मारी और कहा कि बेटा बोल राधेकृष्ण-राधेकृष्ण नरसी जी बोल पडे राधेकृष्ण-राधेकृष्ण। नरसी जी की दादी बहुत खुश हुई और बाबा को बहुत सारी धन दौलत देने लगी तब संत जी बोले कि मै इस धन दौलत का क्या करूंगा आप इसे अपने साथ ही लेते जाइये मुझे यह सबकुछ नही चाहिये। नरसी जी की दादी नरसी जी को घर लेकर आ गई।
नरसी जी के भाभी को पता चला कि मेरा देवर देखने और बोलने लग गया। जब नरसी जी बडे हुये तब दादी ने नरसी जी का विवाह कर दिया नरसी जी दिनभर राधेकृष्ण-राधेकृष्ण का जाप करते थे इसके अलावा और वो कोई काम नही करते थे। नरसी जी के विवाह के कुछ दिनों बाद इनकी दादी का देहावसान हो गया। अब नरसी और उनकी पत्नी दोनो दिनभर राधेकृष्ण-राधेकृष्ण का जाप करते रहते थे। नरसी जी की भौजाई नरसी और इनकी पत्नी को देखकर जलती रहती कि ये कुछ काम धंधा तो करता नही है सिर्फ बैठे-बैठे दिनभर भोजन करता है। एक दिन नरसी जी ने अपनी भौजाई से कहा कि भाभी आज मुझे दूध रोटी खाना है आज मुझे दूध रोटी दे दो।
यह सुनकर इनकी भौजाई और जल गई वह बोली कि कोई काम धंधा तो करते नही हो और दूध रोटी मांग रहे हो जाओ भाग जाओ यहाँ से। यह सुनकर नरसी जी घर छोडकर चले गये बीच मे उन्हे जंगल मिला और वहाँ पर एक शिवलिंग था नरसी जी उसी शिवलिंग से लिपटकर भगवान भोलेनाथ का नाम लेकर रोने लगे और कहने लगे कि प्रभु मुझे एक बार राधेकृष्ण का दर्शन करवा दो। नरसी जी इसी तरह पूरे सात दिनो तक बिना कुछ खाये पिये भगवान भोलेनाथ के शिवलिंग से लिपटे रहे।
आखिर मे भगवान भोलेनाथ नरसी जी के ऊपर प्रसन्न हो गये तथा नरसी जी के समक्ष प्रकट हो गये और कहने लगे कि बेटा तुझे क्या चाहिये? तूने सात दिनो तक बिना कुछ खाये पिये मेरी तपस्या की है जो तुझे मांगना हो मांग ले। तब नरसी जी ने भगवान भोलेनाथ से कहा कि हे भोलेनाथ मुझे एक बार राधेकृष्ण का दर्शन करवा दो और इसके अलावा मुझे आपसे कुछ नही चाहिये। भगवान भोलेनाथ नरसी जी को लेकर गोलोक धाम मे गये वहाँ पर श्री कृष्ण राधा जी के साथ नाच रहे थे।
भगवान भोलेनाथ को देखकर श्री कृष्ण ने कहा कि ये सांसारिक जीव यहाँ क्यो आया है? तब भगवान भोलेनाथ ने श्री कृष्ण से कहा कि हे प्रभु ये सांसारिक जीव आपका बहुत बडा भक्त है। तब श्री कृष्ण ने नरसी जी को अपने हृदय से लगा लिया और नरसी जी कहा कि बेटा अब तुम पृथ्वी लोक पर वापस चले जाओ और धर्म का प्रचार प्रसार करो हमारी कथा को लोगो को सुनाओ हमारा प्रचार प्रसार करो। जो लोग अधर्म के मार्ग पर चल रहे है उन्हे रोको। उसके बाद नरसी जी अपने घर वापस आ गये। अब नरसी की भौजाई ने नरसी जी को अलग कर दिया। कुछ दिनो बाद नरसी जी की बेटी हुई उसका नाम नानी बाई था।
जब नानी बाई बडी हुई तब नरसी जी ने अंजार नगर मे अपनी बेटी नानी बाई का विवाह कर दिया। अब नरसी जी दिन रात राधेकृष्ण-राधेकृष्ण का भजन करते रहते और आते जाते लोग खाने के लिये कुछ दाल, चावल, पैसा दान कर देते इसी से नरसी जी का गुजारा चलता था। कुछ दिनो के बाद नानी बाई की एक पुत्री पैदा हुई जब वह विवाह योग्य हो गई तब उसके ससुराल वालो ने नरसी जी को एक मायरा भेजा जिसमे कि दहेज मांगा गया था उसमे सोना चांदी के साथ और बहुत कुछ लिखा था जो कि नरसी जी से मांग की गई थी।
नरसी जी ने उस चिट्ठी को भगवान श्री कृष्ण के चरणों मे रख दिया और कहा कि प्रभु बेटी आपकी है इसीलिये मायरा भी आपको ही भरना है अब आप ही सबकुछ जानो मै सिर्फ आपको जानता हूँ। यह कहकर नरसी जी राधेकृष्ण-राधेकृष्ण जपने लगे। उसके बाद नरसी जी सोचने लगे कि मेरी एक ही बेटी है मेरे पास कुछ नही है तो क्या हुआ जो कुछ मेरे पास है मै वही दान कर दूंगा। यह सोचकर नरसी जी अपने भाई के पास गये और कहने लगे कि भईया मुझे बैलगाड़ी दे दो मुझे मायरा भरने जाना है।
यह सुनकर नरसी जी का भाई नरसी को मना कर देता है। उसके बाद नरसी जी गाँव वालो से कहकर किसी तरह बैलगाड़ी का इंतजाम करते है। बैलगाड़ी की कंडीशन अच्छी नही थी और बैल भी बूढे थे। नरसी जी के साथ 10 सूरदास रहते थे वो भी नरसी जी के साथ उनके बैलगाड़ी पर बैठ गये। नरसी जी मायरा भरने के लिये अपने पास गोपीचंदन ले जा रहे थे। सभी गाँव वाले इन लोगो को देखकर हस रहे थे। अब नरसी जी के बैलगाड़ी पर कुल 11 लोग थे और नरसी जी बैलगाड़ी को चला रहे थे। अब रास्ते मे अंधेरा हो चुका था सुनसान सडक थी कि बीच मे आगे ढलान आ गई और बैलगाड़ी चलते-चलते अचानक पलट गई।
अब बैलगाड़ी की रस्सी टूट गई गाडी ऊपर हो गई और नरसी सहित सभी सूरदास गाडी के नीचे हो गये। अब नरसी जी भगवान श्री कृष्ण को याद करने लगे और कहने लगे कि हे प्रभु आपने अर्जुन के रथ को सम्हाला था आज मेरी बैलगाड़ी सम्हालो। जब भक्त ने श्री कृष्ण को इस तरह याद किया तो श्री कृष्ण एक आदमी का रूप धारण करके नरसी जी के पास आ गये और नरसी जी से कहने लगे कि मुझे नरसी जी के भात मे जाना है मुझे ले चलो।
नरसी जी कहने लगे कि हमारी गाडी टूटी हुई है और मै ही नरसी हूँ तुम भात मे जाकर क्या करोगें? भगवान ने कहा कि मै भी नरसी जी का भात देखना चाहता हूँ मै भी मायरा भरूंगा। तब नरसी जी कहने लगे कि पहले इस बैलगाड़ी को तो सही कर लो उसके बाद चलते है। भगवान श्री कृष्ण बैलगाड़ी को बनाने लगे और थोडी ही देर मे बैलगाड़ी बनकर तैयार हो गई। नरसी जी ने उस व्यक्ति से कहा कि तुमने बैलगाड़ी बनाई है अब तुम्ही इसे चलाओ।
सभी बैलगाड़ी पर सवार हो गये और बैलगाड़ी एक विमान के रफ्तार से चलने लगी। सुबह होते ही बैलगाड़ी अंजार नगर मे पहुच गई। भगवान श्री कृष्ण ने नरसी जी सेऔऔ कहा कि यहाँ हमारे कुछ रिश्तेदार है हम उनसे मिलकर तैयार होकर अभी भात मे मायरा भरने के लिये आयेगें। दोस्तो श्री कृष्ण ने नरसी जी के भात मे मायरा भरा। पहले लोग श्री कृष्ण को माखनचोर कहते थे लेकिन जब से श्री कृष्ण ने नरसी जी का मायरा भरा तब से लोग श्री कृष्ण को सावरिया सेठ कहते है।