वेद व्यास और शुकदेव की सीख बच्चों की बातें भी ध्यान से सुननी चाहिए

वेद व्यास और शुकदेव से जुड़ा प्रसंग है। चारों वेदों का संपादन करने वाले वेद व्यास के यहां शुकदेव का जन्म हुआ था। शुकदेव जन्म लेते ही ज्ञानी और वैरागी हो गए थे।

शुकदेव बहुत प्रतिभाशाली थे। जन्म लेने के तुरंत बाद शुकदेव अपना घर छोड़कर जा रहे थे। उस समय पुत्र मोह में फंसे वेद व्यास उन्हें रोकने की कोशिश करने लगे।

वेद व्यास ने शुकदेव से कहा कि तुम हमारी संतान हो। बड़ी तपस्या के बाद तुम्हारा हमारे यहां जन्म हुआ है। जन्म लेते ही तुम अपने माता-पिता को छोड़कर कैसे जा सकते हो?

शुकदेव ने कहा कि आप पुत्र मोह की वजह से ये बातें कह रह रहे हैं। मेरे जन्म का एक उद्देश्य है। आप मुझे जाने दीजिए। मुझे मेरे ज्ञान से, वैराग्य से सभी लोगों का भला करना है।

व्यास जी ने शुकदेव को समझाते हुए कहा कि संतान से ही माता-पिता को सुख मिलता है। संतान की वजह से माता-पिता की सभी दिक्कतें दूर होती हैं। लोग इसलिए बच्चे की कामना करते हैं।

शुकदेव ने कहा कि पिता जी आप मोह में फंसे हुए हैं, इसलिए मुझे रोक रहे हैं। आप मुझे जाने दें, मेरे जन्म का उद्देश्य सिर्फ माता-पिता की सेवा करना नहीं, बल्कि समाज कल्याण करना है।

व्यास जी को ये बातें समझ आ गईं और उन्होंने शुकदेव को खुशी-खुशी जाने दिया।

वेद व्यास और शुकदेव की सीख

पिता-पुत्र की ये बातचीत हमें ये संदेश दे रही हैं कि हमेशा बड़े ही सही बोलते हैं, ऐसा नहीं है। कभी-कभी बच्चे भी सही बात कह देते हैं। बड़ों की जिम्मेदारी है कि अपने बच्चों की बातें भी ध्यान से सुनें और जो बातें सही हों, उन्हें स्वीकार भी करें। बच्चों की बातों पर भी ध्यान देंगे तो कई समस्याएं दूर हो सकती हैं।



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