भीष्म पंचक का भीष्म पितामह से क्या है संबंध, समझें पूजा विधि और महत्व

हिंदू पंचांग में कार्तिक माह में आने वाले भीष्म पंचक में व्रत रखना शुभ माना जाता है। इस दिन व्रत रखने से आपके पाप धुल जाते हैं। भीष्म पंचक भीष्म पितामह की याद में मनाया जाता है। ऐसी मान्यता है कि भीष्म पितामह जब मृत्यु शैया पर थे तब देव उठनी एकादशी से कार्तिक पूर्णिमा तक उन्होंने पांडवों को ज्ञान दिया था। उन्होंने बताया था कि कैसे अपने पापों से तुम्हें छुटकारा मिलेगा। शास्त्रों के अनुसार इस दिन आप सच्चे मन से कोई भी मनोकामना मांगते हैं तो वह पूरी होती है।

ज्योतिषाचार्य पंडित अरविंद त्रिपाठी ने विस्तान से बताया कि भीष्म पंचक पर कब, कैसे पूजा करनी है और इसका महत्व क्या है।

भीष्म पंचक कब से होगा शुभ?

भीष्म पचंक 23 नवंबर से 27 नवंबर तक मनाया जाएगा। इस दौरान यह पांच दिन बहुत ही शुभ है। आपके हर कार्य इस दौरान सफल होते हैं। भीष्म पचंक में पूजा करते समय तुलसी के पौधे पर दीपक जलाकर रखना चाहिए। ऐसा करने से आप पर माता लक्ष्मी की कृपा बनी रहेगी।

भीष्म पंचक का महत्व जानें

यह माना जाता है कि पितामह भीष्म मृत्यु शैया पर मृत्यु का इंतजार कर रहे थे। तभी उनके पास भगवान कृष्ण और पांडव आते हैं। वह उनसे कहते हैं कि आप हमें धर्म पर उपदेश दीजिए। उनके आग्रह को भीष्म पितामह ने माना। उन्होंने राज धर्म, वर्ण धर्म, मोक्ष धर्म पर कुल पांच दिनों तक भगवान कृष्ण और पांडव को उपदेश दिया।
भीष्म पितामह के उपदेशों को सुनकर भगवान कृष्ण काफी खुश हुए। उन्होंने कहा कि पितामह आप शुक्ल पक्ष की एकादशी से लेकर पूर्णिमा तक पांच दिनों तक लगातार धर्म का ज्ञान हमें देत रहे। आपके ज्ञान को पाकर हम काफी संतुष्ठ हैं। मैं इन दिनों को भीष्म पंचक के रूप में मनाने का कहता हूं। इन पांच दिनों में भगवान विष्णु की उपासना करने वाले को सभी सुख-सुविधाएं मिलेंगी।

भीष्म पंचक की इस विधि से करें पूजा

भीष्म पंचक वाले दिन भगवान की विष्णु की पूजा करनी चाहिए। इस दिन गंध, पुष्प, धूप और नैवेद्य से ही पूजा करनी चाहिए। पद्म पुराण की मानें तो इस दिन सामान्य पूजा के अलाव भी भगवान विष्णु की पूजा करनी होगी। आपको पहले दिन उनके हृदय की पूजा करनी पड़ेगी और कमल का फूल चढ़ाना होगा। दूसरे दिन उनके बिल्व पत्र कमर पर चढ़ाना चाहिए। तीसरे दिन घुटने पर फूल चढ़ाकर पूजा करें। चौथे दिन पैरों की पूजा चमेली के फूल के साथ करें। पांचवे दिन व्रत का अंत कर ब्राह्मणों को भोजन कराकर और खुद भी करें। व्रत को करने से शुभ फल मिलेगा।


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