भगवान दूसरो की मदद कब करते है।

भगवान का मतलब भूमि, गगन, वायु और नभ इन सबसे मिलकर बना है भगवान शब्द। हमारे हिंदू धर्म शास्त्र के अनुसार 33 करोड देवी देवता है लेकिन दोस्तो क्या आपको पता है वास्तविकता मे भगवान सिर्फ एक ही होता है और वही पूरी दुनिया का मालिक होता है। भगवान गीता मे कहते है कि जब-जब इस धरती पर अधर्म और अन्याय होता है तब-तब मै पापियों के सर्वनाश तथा धर्म की स्थापना के लिये अवतार लेता हूँ

और धर्म की स्थापना करता हूँ। ये 33 करोड देवी देवता उसी परमेश्वर की ही शक्तियां है। वो परब्रम्ह और निराकार है हम जिस रूप मे उसकी पूजा करते है वो उसी रूप मे आकर हमे दर्शन देता है। ईश्वर नही बल्कि उसकी शक्तियां इस धरती पर अवतरित होती है। परमेश्वर अजर, अमर अविनाशी है। हम सबकी आत्मा भी उसी परमात्मा का एक अंश है जिसकी वजह से हम सबकी आत्मा भी अजर, अमर, अविनाशी है।

भगवान दूसरो की मदद कब करते है-

दोस्तो आपको पता होगा कि विश्वास पर ही ये दुनिया टिकी हुई है। यदि आपको ईश्वर मे सच्ची आस्था है तो आपको पत्थर मे भी भगवान के दर्शन हो जायेंगे और यदि आप ईश्वर के प्रति आस्था नही रखते है तो आपको उसका दर्शन कभी भी नही हो सकता है। इसीलियें हमे ईश्वर के प्रति अपने मन मे गहरी आस्था रखनी चाहियें। दोस्तो यदि आपने गीता उपदेश सुना हो तो उसमे अर्जुन श्री कृष्ण से यह प्रश्न पूछते है कि माधव ये बताइये तुम चढावे मे सोना, चांदी, हीरा, मोती, प्रसाद ये सब क्यो लेते हो क्या तुम्हें महगे-महगे चढावे चाहियें और तुम दूसरो की मदद क्यो नही करते हो।

तब श्री कृष्ण अर्जुन को समझाते हुये कहते है कि हे अर्जुन किसने कहा कि मुझे महगे-महगे चढावे चाहिये मै इन सबका क्या करूंगा मेरे पास तो पूरा भंडार भरा पडा हुआ है सबको मै देता हूँ सबकी इच्छा मै पूरी करता हूँ मैने कभी भी अपने भक्तो से महगे-महगे चढावे नही मांगे मै तो सिर्फ भाव का भूखा हूँ। जो व्यक्ति हमारे प्रति अपने मन मे सच्ची आस्था रखता है और मात्र एक फूल सच्चे भाव से चढा देता है मै उसे स्वीकार कर लेता हूँ। उसके बाद श्री कृष्ण अर्जुन को उपदेश देते हुये कहते है कि अर्जुन तुमने ये भी मुझसे कहा कि मै दूसरो की मदद क्यो नही करता तो सुनो जिन लोगो को अपने धन, बल और बुद्धि पर बडा अभिमान होता है और वो कहते है कि मै खुद सबकुछ कर लूंगा फिर ऐसे लोगो को मुझे क्या जरूरत है

जब सबकुछ आप ही कर लेगे तो आपको हमारी क्या आवश्यकता है। इसीलिये हे अर्जुन मै सिर्फ उसी व्यक्ति की मदद करता हूँ जो अपना सबकुछ मुझे ही समझता है अपना अभिमान त्यागकर सबकुछ मुझे समर्पण कर देता है। मै कालो का काल हूँ मै ही चारो तरफ इस दुनिया मे फैला हुआ हूँ। सभी जीवो मे आत्मा रूप मे मै ही विराजमान हूँ। यदि बडा से बडा पापी अपने अंतिम समय मे मुझे याद कर लेता है अपना सबकुछ मुझे समर्पित कर देता है तो मै उसे अपने शरण मे अपने चरणो मे स्थान दे देता हूँ। मुझे लोग माधव, कृष्ण, मुरारी, नारायण, हरि, राधेश्याम, श्यामसुंदर इत्यादि नामो से जानते है। जगत के कण-कण मे मै ही विद्यमान हूँ।



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