तब भोलेनाथ बोले कि देवी ये सभी गंगा स्नान करने के लिये जा रहे है। फिर पार्वती ने कहा कि गंगा स्नान करने से इनको क्या फायदा मिलेगा तब भोलेनाथ ने कहा कि देवी जो लोग सच्चे मन से गंगा स्नान के लिये संगम नगरी आते है उनके समस्त पाप धुल जाते है अंत मे वो मोक्ष को प्राप्त हो जाते है।
तब माता पार्वती ने कहा कि क्या ये सभी मोक्ष को प्राप्त हो जायेंगे तब भोलेनाथ ने कहा बिल्कुल नही सबको मोक्ष नही मिलेगा क्योंकि यहाँ पर लोग पुण्य ही नही बल्कि पाप भी करने के लिये आते है यह कहते हुये भोलेनाथ ने माता पार्वती से कहा चलो आज हम तुम्हारे सामने दिखायेंगे कि यहाँ पर कौन पाप करने आता है और कौन पुण्य करने आता है। यह कहकर भगवान भोलेनाथ ने एक कोढी का रूप धारण कर लिया और दोनो वही गंगा नदी के किनारे बैठ गये।
माता पार्वती भगवान भोलेनाथ को बेना हांककर हवा कर रही थी। उसी समय कुछ युवक वहाँ पर आते है और माता पार्वती से कहते है कि आप इस कोढी व्यक्ति के साथ क्या कर रही है आप इतनी सुंदर है अतः आप हमारे साथ चलिये यह सुनकर माता पार्वती ने कहा कि नही ये मेरे पति परमेश्वर है अतः मै इन्हे छोडकर कही नही जा सकती आप यहाँ से जा सकते है। यह सुनकर वह सभी युवक वहाँ से चले गये।
उसके कुछ समय बाद कुछ महिलाये वहाँ से गुजर रही थी और भगवान भोलेनाथ को कोढी रूप मे देखकर कहने लगी कि देखो ये महिला कितनी सुंदर है और इसे कोढी व्यक्ति मिला है इसने अपने गले मे बहुत सारे गहने पहने हुये है अतः यदि ये कहने हमको मिल जाते तो अच्छा होता यह कहकर वह महिलाये आगे बढ गई।
उसके बाद एक व्यक्ति फिर आता है वो भगवान भोलेनाथ का सच्चा भक्त था। उसने भगवान भोलेनाथ को कोढी रूप मे देखा तो उसे बडी दया आ गई और माता पार्वती से कहने लगा कि क्या हुआ माता मै आपकी क्या मदद कर सकता हूँ तब माता पार्वती ने कहा कि ये मेरे पति है और इन्हे कोढ हुआ है यदि इन्हे गंगा मे
स्नान करा दिया जाय तो ये कोढ से मुक्त हो जायेंगे। यह सुनकर वह व्यक्ति बोला कि आप चिंता मत करिये मै इन्हे गंगा स्नान करवाऊंगा। यह सुनकर वह व्यक्ति भोलेनाथ को अपने कंधे पर उठा लिया और गंगा स्नान करवाने के लिये निकल पडा। उसने भगवान भोलेनाथ को गंगा स्नान करवाया उसके बाद भगवान भोलेनाथ और पार्वती दोनो अपने असली रूप मे आ गये और उस व्यक्ति से कहा कि तुम मेरे सच्चे भक्त हो अतः मृत्यु के पश्चात तुम्हे स्वर्ग लोक की प्राप्ति होगी। यह कहकर भगवान भोलेनाथ और माता पार्वती दोनो वहाँ से अंर्तध्यान हो गये।