Select Date:

भगवान जगन्नाथ को भिक्षा क्यो मांगनी पडी।

Updated on 01-01-1970 12:00 AM

दोस्तो एक बार लक्ष्मी देवी अपनी भक्तिन श्रेया चांडाल के घर पर आर्शीवाद देने गई हुई थी वहाँ से निकलते हुये उन्हे भगवान जगन्नाथ और बलराम ने देख लिया अब बलराम जी को यह बात बिल्कुल भी पसंद नही आई कि लक्ष्मी जी एक चांडाल के घर मे जाकर आई है इसीलिये उन्होंने जगन्नाथ जी को यह आदेश दिया कि वो लक्ष्मी को श्री मंदिर से बाहर निकाल दें। अब भगवान जगन्नाथ जी फस गये क्योंकि बडे भाई की आज्ञा मानना बहुत जरूरी था इसीलिये उन्होंने लक्ष्मी देवी का क्रोध अपने सिर ले लिया

जिसके फलस्वरूप लक्ष्मी देवी अपने सारे ऐश्वर्य और सेवको के साथ मंदिर छोडकर चली गई। अब अगले दिन बलदेव जी प्रातः कालीन भोग की प्रतीक्षा कर रहे थे लेकिन कोई भोग लेकर नही आया तो उन्होंने जगन्नाथ जी से पूछा कि क्या बात है आज कोई भोग लेकर नही आया। आज भोग लाने मे इतना विलंब क्यो हो रहा है तो जगन्नाथ जी ने अपने पेट पर हाथ रखते हुये कहा कि भइया आज से कोई भोग नही आयेगा क्योंकि लक्ष्मी देवी अपने सेवकों के साथ ये मंदिर छोडकर चली गई है। जब बलराम जी ने यह सुना तो उन्होंने कहा कि चलो अच्छी बात है यदि लक्ष्मी देवी ने भूल की है तो प्रायश्चित तो करना ही पडेगा।

कोई बात नही अब हम अपना भोग स्वयं बनायेंगे। यह सोचकर जगन्नाथ जी और बलराम जी ने रसोई घर मे प्रवेश किया। अब वहाँ देखा तो पूरा अन्न भंडार खाली पडा हुआ है यहाँ तक की कोई सब्जी भी नही है। अब इतनी देर मे दोनो भाइयों को अत्यधिक भूख भी लग गई उन्होंने सोचा कि चलो किसी के घर से भिक्षा ही मांग लेते है यह सोचकर उन दोनो ने एक ब्राम्हण का वेश धारण किया और घर-घर जाकर भिक्षा मांगने लगे जिससे उन्हें कोई पहचान न सके। उन्हें कोई भिक्षा नही दे रहा था क्योंकि लक्ष्मी देवी के जाने के बाद उनका चेहरा बिल्कुल मलीन हो गया था।

लक्ष्मी देवी के आदेश पर सूर्य देव ने अपनी किरणें और तेज कर दी जिससे गर्मी और बढ गई। जिसके परिणामस्वरूप भगवान जगन्नाथ और बलराम जी को तपती हुई धूप मे चलना पड रहा था। भूख और प्यास से वो दोनो परेशान हो गये थे कि अचानक सामने उन्होंने एक तालाब देखा लेकिन जैसे ही वो दोनो वहाँ पहुंचे वैसे ही तालाब का पानी सूख गया। हताश होकर वो एक हरे भरे पेड के पास पहुंचते है और सोचते है कि इस पेड के पत्ते खाकर ही अपनी भूख मिटा देते है जैसे ही उन्होंने पत्ते तोडने के लिये आगे हाथ बढाया वैसे ही पत्ता भी सूख गया और सारे पत्ते सूखकर नीचे जमीन पर गिर गये।

इसी तरह से शाम हो गई पूरे दिन इन दोनो को न तो कुछ खाने के लिये मिला और न ही पीने के लिये मिला। थक हारकर ये दोनो एक मंदिर के पास पहुंचते है जहाँ पर अभी भी प्रसाद वितरण हो रहा था। उन्होंने विनती की कि उन्हें कुछ खाने को दे दें लेकिन लक्ष्मी जी का क्रोध तो आप जानते ही है फलस्वरूप उन लोगो ने भगवान जगन्नाथ और बलराम जी को कुछ भी खाने को नही दिया। ऐसे मे एक वृद्ध महिला को उन दोनो पर दया आ गई। उस वृद्ध महिला ने उन दोनो को एक पात्र मे मुरमुरे खाने को दिये इस प्रसाद को देखकर वो दोनो प्रसन्न हो गये।

जैसे ही प्रसाद लेने के लिये उन दोनो ने हाथ आगे फैलाया उसी समय तेजी से हवा चली और सारा प्रसाद जमीन पर आ गिरा। अब आप ही सोचिये उस समय भगवान जगन्नाथ और बलदेव जी की क्या स्थिति हुई होगी। ये वही जगत के जगन्नाथ और बलराम जी है जिन्हें दिन मे कई बार भोजन दिया जाता है। उनके हाथ कभी भी सूखने नही दिये जाते थे। जो कि एक ही समय मे 56 भोग खाते थे। ऐसे मे आज हमारे जगन्नाथ और बलदेव जी को आज एक सूखा पत्ता भी नही मिल रहा था ऐसे मे अब आप ही सोचिये कि उनकी क्या स्थिति रही होगी।

ऐसे मे उन्होंने एक व्यक्ति से पूछा कि भाई हमें बहुत भूख लगी है हमें भोजन कहाँ पर मिल सकता है तो उस व्यक्ति ने कहा कि वो देखिये वो चांडालों का गाँव है वहाँ पर एक स्त्री रहती है जो कि बहुत दयालु है। आपको वहाँ पर निश्चिंत ही भोजन मिल जायेगा। यह सुनकर भगवान जगन्नाथ और बलदेव जी उस स्त्री के घर गये उस स्त्री ने उन दोनो का आदर सत्कार किया और कहा कि अभी वह उन दोनो के लिये भोजन बनाकर लाती है। लेकिन बलदेव जी को यह बात पसंद नही आई कि वो एक चांडाल स्त्री के हाथ का बना हुआ भोजन नही करेंगे

तो उन्होंने उस चांडाल स्त्री से कहा कि आप हमें राशन सामग्री दे दीजिये अब अपना भोजन स्वयं बनायेंगे। यह सुनकर उस स्त्री ने कहा कि ठीक है जैसी आपकी इच्छा। यह कहकर उसने घर मे ही एक नये स्थान पर चूल्हा बनाकर दिया स्वच्छ और नये बर्तन लाकर रखें तथा बलराम जी की इच्छानुसार सारी व्यवस्था कर दी गई। अब बलराम जी ने जगन्नाथ जी से कहा कि तुम भोजन बनाओ और मै स्नान करके आता हूँ। यह कहकर प्रसन्नतापूर्वक बलराम जी स्नान करने के लिये चले गये और पीछे हमारे प्यारे जगन्नाथ जी को छोड गये।

अब जगन्नाथ जी अपने भाई के आज्ञानुसार भोजन पकाने के लिये बैठ गये। अब भोजन तो तब बनेगा जब चूल्हा जलेगा। अतः जगन्नाथ जी ने बहुत प्रयास किया लेकिन चूल्हा जल ही नही रहा था। अब बलराम जी प्रसन्नता पूर्वक स्नान करके आ रहे थे उन्होंने ये सोचा कि भोजन तो पक ही गया होगा। लेकिन जब बलराम जी जगन्नाथ जी के पास पहुचे तो उन्होंने देखा कि जगन्नाथ जी ने अभी कुछ भी नही बनाया था। अतः बलराम जी ने जगन्नाथ जी को अच्छी खासी डाट फटकार लगा दी कहा कि इतना समय हो गया और तुम अभी तक चूल्हा भी नही जला पाये हो।

चलो हटो यहाँ से अब मै खुद ही भोजन पकाता हूँ। जब बलराम जी चूल्हा जलाने की कोशिश करते तो आग की जगह धूंआ निकल रहा था। उन्होंने बहुत प्रयास किया लेकिन चूल्हा नही जला। परिणामस्वरूप पूरा घर धूंये से भर गया और दोनो लोग खांसने लगे। जिसके कारण उन दोनो की आँखो से पानी बहने लगा। थकहार कर जगन्नाथ और बलदेव जी ने उस घर की स्त्री से कहा कि वही उन दोनो को खाने के लिये कुछ दे देंं। वह स्त्री उन दोनो के लिये भोजन लेकर आई जैसे ही उन दोनो ने भोजन करना शुरू किया उन दोनो को भोजन बहुत ही स्वादिष्ट लगा।

उसका स्वाद भी उन्हें कुछ जाना पहचाना सा लग रहा था। वो भोजन बिल्कुल वैसा ही था जैसा कि लक्ष्मी जी उन्हे भोजन पकाकर देती थी। भोजन के अंत मे उन्हे विशेष तरह का मिष्ठान परोसा गया जब उसे बलराम और जगन्नाथ जी ने खाया तो उन्हे बडा आश्चर्य हुआ क्योंकि वह वही मिष्ठान था जो कि लक्ष्मी जी उनके लिये प्रतिदिन बनाती थी। इसके बारे मे किसी और को जानकारी नही थी फिर उस स्त्री ने कैसे मिठाई बना ली। ये देखकर उन दोनो भाइयो को यह विश्वास हो गया कि अवश्य ही इस घर मे लक्ष्मी जी रहती है और यह भोजन भी उन्ही के द्वारा बनाया गया था अन्यथा इस घर की स्त्री को कैसे पता चलता कि भगवान जगन्नाथ और बलराम जी भोजन के बाद एक विशेष मिष्ठान लेते है।

उन दोनो भाइयों को अपनी भूल का एहसास हुआ खासकर बलराम जी को। अतः बलराम जी ने जगन्नाथ जी कहा कि वो लक्ष्मी जी के पास जाकर क्षमा मांगे और उन्होंने यह भी संदेह जगन्नाथ जी के द्वारा भिजवाया की आज के बाद लक्ष्मी जी अपनी इच्छा से कही भी आ जा सकती है उन्हे कभी भी अपने भक्तो से मिलने के लिये रोका नही जायेगा। अपने बडे भाई की आज्ञा पाकर भगवान जगन्नाथ जी अपनी पत्नी लक्ष्मी जी के पास आ गये उनके इस तरह मनाने पर लक्ष्मी देवी मान गई और श्री मंदिर मे चलने के लिये तैयार हो गई। लक्ष्मी देवी ने जगन्नाथ जी को यह वचन दिया कि जगन्नाथ जी के प्रसाद के लिये कभी भी ऊँच नीच का भेदभाव नही किया जायेगा चाहे वो ब्राम्हण हो या चांडाल दोनो को समान रूप से जगन्नाथ जी का महाप्रसाद दिया जायेगा।



अन्य महत्वपुर्ण खबरें

 01 January 1970
कहते हैं ना कि अति किसी भी चीज़ की अच्छी नही होती बस वैसा ही कुछ चंद्रमा के साथ (Chandra Dev Ko Shrap) हुआ। कहने को तो चंद्रमा एक देवता…
 01 January 1970
भगवान परशुराम भगवान विष्णु के दस अवतारों में से एक (Parshuram Unknown Facts In Hindi) है। उनका जन्म ब्राह्मण कुल में हुआ था जो वामन अवतार के बाद तथा श्रीराम…
 01 January 1970
भगवान परशुराम विष्णु के एक ऐसे अवतार हैं जो चिरंजीवी (Karan Ki Mrityu Kaise Hui) हैं। इसी कारण वे विष्णु के अन्य अवतारों के समयकाल में भी थे और अभी…
 01 January 1970
 हिंदू धर्म में नवरात्रि पर्व पूरे उत्साह के साथ मनाया जाता है। नवरात्रि पर्व के आखिर में अष्टमी व नवमी तिथि को कन्या पूजन किया जाता है। हिंदू पंचांग के…
 01 January 1970
ऋषि वशिष्ठ महान सप्तऋषियों में से एक हैं. महर्षि वशिष्ठ सातवें और अंतिम ऋषि थे. वे श्री राम के गुरु भी थे और सुर्यवंश के राजपुरोहित भी थे. उन्हें ब्रह्माजी…
 01 January 1970
नरसी मेहता महान कृष्ण भक्त थे. कहा जाता है कि भगवान श्री कृष्ण ने उनको 52 बार साक्षात दर्शन दिए थे. नरसी मेहता का जन्म जूनागढ़, गुजरात मे हुआ था.…
 01 January 1970
जब द्रौपदी को खबर मिली कि उसके पांच पुत्रों को अश्वत्थामा ने मार डाला है, तो वह अनिश्चितकालीन उपवास पर बैठ गई और कहा कि वह उपवास तभी तोड़ेगी जब…
 01 January 1970
एक बार महर्षि भृगु और अन्य मुनियों ने सरस्वती नदी के तट पर मिलकर यज्ञ का आयोजन किया। इस यज्ञ में नारद जी भी आए हुए थे। नारद जी ने…
 01 January 1970
Bhagavad Gita Updesh महाभारत के युद्ध में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिया गया उपदेश भगवद गीता में निहित है। आज के समय में भी भगवद गीता की प्रासंगिकता उसी…
Advt.