
भगवान विष्णु ने समुद्र मंथन के समय कच्छपाअवतार लिया था लेकिन उससे पहले यह जानना जरूरी है कि आखिर देवताओं को समुद्र मंथन की आवश्यकता क्यो पडी? दोस्तो कथा के अनुसार एक बार देवराज इन्द्र ने दुर्वासा ऋषि का अपमान कर दिया था जिससे दुर्वासा ऋषि अत्यंत क्रोधित हो गये तथा इन्द्र को श्री अर्थात लक्ष्मी से हीन हो जाने का श्राप दे दिया।
सभी देवता बहुत दुखी हुये और भगवान विष्णु की शरण मे गये तब भगवान विष्णु ने देवताओं को दैत्यों के साथ मिलकर समुद्र मंथन करने का सुझाव दिया। तब देवताओ ने दैत्यों को समुद्र मंथन से निकलने वाले अमृत का लालच दिया जिससे कि सभी दैत्य अमर हो जायेंगे। इससे सभी दैत्य समुद्र मंथन के लिये राजी हो गये। तब देव तथा असुरो मे मिलकर समुद्र मंथन किया।
जब देव और दैत्य दोनो समुद्र मंथन करने के लिये गये तो समुद्र मंथन के लिये सभी ने मिलकर मंदराचल पर्वत को एवं नागराज वासुकी को नेती बनाया परंतु मंदराचल पर्वत के नीचे कोई आधार नही था जिसके कारण पर्वत समुद्र मे डूबने लगा। इस समस्या के निवारण हेतु भगवान विष्णु ने एक विशाल कछुये का रूप धारण किया तथा समुद्र मे उतरे और उन्होंने अपनी पीठ पर मंदराचल पर्वत को रख लिया तथा इस तरह वो आधार बन गये। तब देव और दैत्य दोनो मिलकर समुद्र मंथन करने लगे।
दोस्तो जब देव और दैत्य दोनो मिलकर समुद्र मंथन कर रहे थे तब समुद्र के गर्भ से 14 रत्न निकले थे जो कि निम्नवत है।
दोस्तो समुद्र मंथन का मुख्य उद्देश्य देवताओं को अमर बनाना तथा हरिप्रिया महालक्ष्मी को प्राप्त करना था। इसके अलावा जब भगवान विष्णु ने मत्स्य अवतार लिया था उस समय महाप्रलय हुआ था जिससे बहुमूल्य रत्न तथा औषिधियाँ समुद्र की गहराइयों मे चला गया था इन्हे प्राप्त करना अत्यंत आवश्यक था क्योंकि इसी मे सृष्टि का कल्याण संभव था।