उसके बाद वह कन्हैया का नाम लेकर सो गई। लेकिन दोस्तो कहा जाता है कि दाने-दाने पर लिखा है खाने वाले का नाम। ब्राम्हणी के सोते ही उसकी कुटिया मे कुछ चोर चोरी करने के लिये गये लेकिन उस ब्राम्हणी के कुटिया मे चने के अलावा कुछ भी नही मिला। चोर उस चने की गठरी मे सोना, चांदी रखा है ऐसा सोचकर ले जाने लगे इतने मे ही उस ब्राम्हणी की नींद खुल गई और वह जोर-जोर से शोर मचाने लगी। उस ब्राम्हणी का शोर सुनकर सभी गाँव वाले चोर को पकडने के लिये दौडे। उधर चोर चने से भरी पोटली लेकर भाग गये। पकडे जाने के डर से सभी चोर संदीपन ऋषि के आश्रम मे छुप गये।
जहाँ पर सुदामा तथा भगवान श्री कृष्ण ने शिक्षा प्राप्त की थी। तब गुरूमाता को लगा कि कोई आश्रम के अंदर आ गया है। इतने मे चोरो को संदेह हो गया कि कोई आ रहा है। इससे चोर डर गये और भागने लगे। भागते-भागते रास्ते मे ही चने से भरी पोटली वही गिर गई और सभी चोर भाग खडे हुये। दूसरी तरफ वह ब्राम्हणी भूख से बहुत परेशान थी। जब ब्राम्हणी को यह पता चला कि चोरो ने उसकी चने की पोटली चुरा ली है तो उसने यह श्राप दिया कि मेरी पोटली का चना जो कोई भी खायेगा वह दरिद्र हो जायेगा। वही जब सुबह गरू माता आश्रम मे झाडू लगा रही थी तो सफाई करते समय चने से भरी पोटली उन्हे मिलती है।
गुरू माता ने जब उस पोटली को खोलकर देखा तो उसमे चने थे। सुदामा और श्री कृष्ण रोज की तरह जंगल से लकडी लाने के लिये जा रहे थे तभी गुरू माता ने सुदामा को चने से भरी पोटली दे दी और सुदामा से गरू माता ने कहा कि भूख लगने पर इसे दोनो लोग आपस मे मिल बांटकर खा लेना। जैसे ही सुदामा ने चने की पोटली अपने हाथ मे ली वैसे ही सुदामा को यह पता चल गया कि यह चना श्रापित है और इस चने को जो कोई भी खायेगा वो दरिद्र हो जायेगा। चूंकि सुदामा भगवान श्री कृष्ण का बहुत बडा भक्त था इसीलिये उसने सोचा कि इस चने को मै खुद ही खाऊंगा। सुदामा ने उस श्रापित चने को खाकर उसका श्राप अपने सिर पर ले लिया। दोस्तो यही कारण है कि सुदामा को पूरा जीवन गरीबी मे ही बिताना पडा।