शक्तिपीठों की यात्रा के नौवें पड़ाव में आज हम आए हैं नेपाल की राजधानी काठमांडू से 3-4 किमी की दूरी पर स्थित श्री गुह्येश्वरी शक्तिपीठ। इस मंदिर को गुहेश्वरी और गुजेश्वरी के नाम से भी जाना जाता है। ये शक्तिपीठ वनकाली जंगल में बागमती नदी के किनारे पर पशुपतिनाथ क्षेत्र में स्थित है।
नेपाल में गुह्येश्वरी मंदिर से जुड़ी कई मान्यताएं प्रचलित हैं। एक मान्यता के मुताबिक, इस जगह पर देवी सती के घुटने गिरे थे। महाशिरा और महामाया भी देवी के नाम हैं। यहां के भैरव कपाली हैं।
सप्तमी से मंदिर में होते हैं विशेष आयोजन
मंदिर के पुजारी राजेशमान कर्मचार्य कहते हैं, नवरात्रि के दिनों में यहां कई तरह की तांत्रिक पूजाएं की जाती हैं। सप्तमी, अष्टमी, नवमी, दशमी, एकादशी पर विशेष आयोजन होते हैं।
दैनिक नित्य पूजा में शिव और आदि शक्ति का पूजन होता है। इनके साथ ही अष्ट मातृका, गणेश जी, भैरव, शेषनाग, वासुकी नाग और अन्य देवी देवताओं की भी पूजा होती है।
यहां की पूजा में तांत्रिक मंत्रों का जप किया जाता है। ये मंत्र गुप्त रखे जाते हैं। यहां देवी की पूजा पुजारी बाएं हाथ से करते हैं और अन्य देवताओं की पूजा दाएं हाथ से करते हैं।
मंदिर में सामान्य भक्त चंडी पाठ और दुर्गा सप्तशती का पाठ करते हैं। नेपाल में दशईं यानी विजया दशमी पर्व बड़े पैमाने पर मनाया जाता है।
मंदिर में कुल 45 पुजारी, सभी के काम हैं अलग-अलग
मंदिर के गर्भगृह में प्राकृतिक छिद्र से बहता रहता है पानी
मंदिर के गर्भगृह में एक छिद्र है। ये पूरी तरह से प्राकृतिक है। इस छिद्र से जल की धारा बहती रहती है। ये चांदी के कलश से ढंका हुआ है। मंदिर के धार्मिक आयोजनों से जुड़ी समिति के सदस्य रामकृष्ण डांगोल कहते हैं, ''मंदिर में मार्ग कृष्ण अष्टमी से दशमी विशेष आयोजन होते हैं। इस दौरान देवी गुह्येश्वरी की बहन देवी ताजेलु भवानी यानी तलेजु भवानी की प्रतिमा को मंदिर लाया जाता है। दोनों बहनों की पूजा साथ होती है। इस पर्व में पशु बलि के साथ ही तांत्रिक पूजा भी होती है।''
महामाया को देवी दुर्गा के रूप में पूजा जाता है। यहां प्रचलित मान्यता के अनुसार, भगवान राम ने नौ दिनों तक नवदुर्गा की पूजा की थी। पूजा से प्रसन्न होकर महामाया देवी दुर्गा ने नवमी की रात में राम जी को रावण पर विजय का वरदान दिया था। महामाया के वरदान से राम ने रावण का वध किया। नेपाल में दशहरा दशईं नाम से मनाया जाता है।