शक्तिपीठों की यात्रा के भाग 7 में आज हम आए हैं पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में स्थित हिंगलाज माता मंदिर। ये मंदिर 51 शक्तिपीठों में से एक है। यह हिंगोल नेशनल पार्क में है। कड़ी सुरक्षा जांच के बाद जैसे ही मैंने बलूचिस्तान की सीमा में प्रवेश किया, मकरान हाईवे पर कुछ बसों की छतों पर युवा माता के जयकारे लगाते दिखे। ये बसें उस पहाड़ी की ओर बढ़ रही थीं, जो इस मंदिर के रास्ते में है।
हिंगलाज मंदिर जाने से पहले इस पहाड़ी के दर्शन करने की मान्यता है। यहां मिट्टी के टीले पर गड्ढे (क्रेटर) हैं, जिन्हें चंद्रगुप 1,2, 3 कहा जाता है। इनमें से तीसरा अब दिखाई नहीं देता है। चंद्रगुप-1 करीब 300 फीट ऊंचाई पर है। गड्ढे में खौलती दलदली मिट्टी दिखाई देती है।
परिवार के साथ दर्शन के लिए आए 35 साल के संतोष ने गड्ढे में नारियल डालकर प्रार्थना की। उन्होंने कहा, यहां रुके बिना हिंगलाज यात्रा पूरी नहीं होती है। संतोष की पत्नी गर्भवती हैं और वे माता से बच्चे के स्वास्थ्य की प्रार्थना करने आए हैं।
हर साल यहां दर्शन के लिए आने वाले मोहताशिम बुगती ने बताया कि चंद्रगुप-1 हर साल ऊंचा हो रहा है। ज्वालामुखी से निकली मिट्टी किनारों पर जमा हो रही है। यहां से पांच किमी दूर हिंगोल नेशनल पार्क है। मुख्य द्वार के बाद पांच किमी और चलने पर घने जंगल के बीच एक प्राकृतिक गुफा में मां के दर्शन होते हैं।
मंदिर के मुख्य द्वार से पहले दोनों ओर फूल-प्रसाद, चढ़ावे और खिलौनों की दुकानें हैं। कुछ विश्राम कक्ष भी बने हैं। मुख्य मंदिर से पूर्व काली मंदिर के पास मुझे पाकिस्तान हिंदू मंदिर प्रबंधन समिति के सदस्य वर्सीमल देवानी मिले। दर्जनभर सीढ़ियां चढ़ने के बाद मां हिंगलाज के दर्शन होते हैं।
इस मंदिर में सिंध से बड़ी संख्या में लोग आते हैं। इनमें मुस्लिम श्रद्धालु भी होते हैं। यहीं मेरी मुलाकत मुस्लिम बलूच अब्दुल बुगती से भी हुई। अब्दुल ने कहा कि हिंदुओं के लिए ये देवी हिंगलाज मां हैं और बलूचों के लिए ‘नानी मां।’ हर नवरात्र में बड़ी संख्या में बलूच मुस्लिम यहां आते हैं और यहां आने वाले श्रद्धालुओं की हिफाजत और सहूलियत का ध्यान रखते हैं।
मुस्लिम फकीर अब्दुल लतीफ ने दिया था ‘नानी मां’ नाम
कराची के न्यूरोसर्जन डॉ. परशुराम खत्री ने माता को नानी मां कहे जाने से जुड़ा किस्सा सुनाया। खत्री ने कहा कि मुस्लिम फकीर शाह अब्दुल लतीफ भिट्टाई शक्तिपीठ आए थे। उन्होंने मां को प्रसाद भी चढ़ाया था। इस घटना का जिक्र उनकी कविता में मिलता है। 1752 में उनकी मृत्यु हो गई। यहीं पर उन्होंने माता को नानी मां कहा था। तभी से माता के लिए आस्था रखने वाले मुस्लिम उन्हें नानी मां कहने लगे। अगर बलूचिस्तान में किसी से कहेंगे कि आप हिंगलाज माता मंदिर जा रहे हैं, तो वे तुरंत कहेंगे नानी मां मंदिर।
यहां माता सती का सिर गिरा... इसलिए सिर्फ सिर की पूजा की जाती है
गर्भगृह में भगवा कुर्ता पहने मुख्य पुजारी गोपाल गिरी थे। मैं झुका तो उन्होंने पीठ थपथपाई। गोपाल गिरी ने बताया, यहां पर माता सती का सिर गिरा था, इसलिए पूजा भी सिर्फ सिर की होती है। मूर्ति का निचला हिस्सा पेट का है, जिसे नवरात्र में ढंक देते हैं। देवी को भोग सिर्फ मीठे का लगता है।