मंगलवार, 24 अक्टूबर को दशहरा है। त्रेतायुग में श्रीराम ने आश्विन कृष्ण दशमी पर रावण का वध किया था। रामायण में कई ऐसे प्रसंग हैं, जिनमें जीवन को सुखी और सफल बनाने के सूत्र बताए गए हैं। यहां जानिए ऐसा ही एक प्रसंग...
रामायण में देवी सीता का हरण हो गया था। श्रीराम और लक्ष्मण सीता का खोज रहे थे। राम-लक्ष्मण उस जंगल में पहुंच गए, जहां सुग्रीव बाली की डर से छिपे हुए थे। सुग्रीव के साथ ही हनुमान जी भी थे।
सुग्रीव ने दो राजकुमारों को देखा तो वे डर गए। सुग्रीव ने सोचा कि बाली ने मुझे मारने के लिए इन्हें यहां भेजा है।
सुग्रीव ने हनुमान जी से कहा कि आप देखिए वहां दो राजकुमार दिख रहे हैं, वहां जाकर मालूम करो कि कहीं ये हमारे शत्रु तो नहीं हैं। अगर वे शत्रु हैं तो वहीं से इशारा कर देना, हम यहां से कहीं और भाग जाएंगे। अगर वे मित्र हैं तो वहीं से इशारा करना, हम यहीं रुक जाएंगे।
हनुमान जी सुग्रीव की आज्ञा पाते ही उन दोनों राजकुमारों के सामने पहुंच गए। हनुमान जी वेष बदलकर गए थे। हनुमान जी ने बुद्धिमानी का उपयोग करते हुए अपना सही परिचय बताए बिना राम-लक्ष्मण की परख की। जब हनुमान जी को मालूम हुआ कि ये राम-लक्ष्मण हैं तो वे अपने असली रूप में आ गए और सुग्रीव को इशारा कर दिया कि ये हमारे शत्रु नहीं हैं।
हनुमान जी ने राम-लक्ष्मण से कहा कि आप मेरे राजा सुग्रीव के पास चलिए और उनसे मित्रता कर लीजिए। वे देवी सीता की खोज में आपकी मदद जरूर करेंगे।
दूसरी ओर सुग्रीव हनुमान जी का इशारा पाते ही निश्चिंत हो गए कि ये दो राजकुमार शत्रु नहीं हैं।
हनुमान जी राम-लक्ष्मण को लेकर सुग्रीव के पास पहुंचे और इनकी मित्रता कराई। हनुमान जी समझ गए थे कि इन दोनों की समस्याएं एक-दूसरे की मदद से हल हो सकती हैं। इस मित्रता के बाद श्रीराम ने बाली वध किया और सुग्रीव को राजा बना दिया। इसके बाद सुग्रीव ने अपनी पूरी वानर सेना सीता की खोज में लगा दी। वानर सेना ने रावण से युद्ध में भी श्रीराम का साथ दिया था।
प्रसंग की सीख
इस प्रसंग में हनुमान जी सीख दे रहे हैं कि जब हम कोई काम बुद्धिमानी से योजना बनाकर करते हैं तो उसमें सफलता जरूर मिलती है।