महाविद्या काली पहली महाविद्या मानी जाती हैं जो माँ सती के शरीर से प्रकट हुई थी। इनका रूप अत्यंत भीषण व दुष्टों का संहार करने वाला हैं। माता सती ने क्रोधवश सबसे पहले अपने सबसे भीषण रूप को प्रकट किया था जो फुंफकार रही थी।
रक्तबीज व शुंभ-निशुंभ राक्षसों का वध करने के लिए माँ काली का प्राकट्य हुआ था। रक्तबीज एक ऐसा राक्षस था जिसके रक्त की एक बूँद भी नीचे धरती पर गिरती तो उसमे से एक और रक्तबीज उत्पन्न हो जाता। तब मातारानी ने अपने इस भीषण रूप से उस राक्षस के रक्त की बूंदों को धरती पर गिरने से पहले ही उसे पी लिया था और उसका अंत किया था।
सतयुग में देव-दानवों के बीच हुए समुंद्र मंथन में जब अथाह मात्रा में विष निकला तो उसका पान महादेव ने किया किंतु विष के प्रभाव से उनके अंदर मूर्छा छाने लगी। तब माता पार्वती ने तारा रूप धरकर उन्हें स्तनपान करवाया जिससे शिवजी पर विष का प्रभाव कम हुआ।
पहले दो रूपों में मातारानी ने अपने भीषण रूप प्रकार किये थे। तत्पश्चात उनका यह सुंदर रूप प्रकट हुआ जो अत्यंत ही सुखकारी व मन को लुभा लेने वाला था। इनका प्राकट्य अपने भक्तों के मन से भय को समाप्त करने व अंतर्मन को शांति प्रदान करने वाला था।