मंगलवार, 24 अक्टूबर को दशहरा है। त्रेता युग में आश्विन मास की कृष्ण दशमी पर श्रीराम ने रावण का वध किया था। श्रीराम के जीवन की कई ऐसी घटनाएं हैं, जिनमें सुख, शांति और सफलता पाने के सूत्र बताए गए हैं। अगर इन सूत्रों को जीवन में उतार लिया जाए तो हमारी सभी समस्याएं खत्म हो सकती हैं।
श्रीराम के जीवन की एक महत्वपूर्ण घटना है राज्याभिषेक और वनवास के समय की। कुछ ही समय में पूरा दृश्य बदल गया था। दरअसल, राजा दशरथ ने घोषणा कर दी थी कि राम का राज्याभिषेक होगा। श्रीराम भी ये बात जानते थे। घोषणा दशरथ ने की थी तो इसका बदलना भी संभव नहीं था।
सबकुछ ठीक था, लेकिन राज्याभिषेक से ठीक पहले वाली रात मंथरा की वजह से कैकयी की बुद्धि दूषित हो गई। मंथरा ने कैकयी को अपनी बातों में ऐसा उलझाया कि वह भरत को राजपाठ देने और राम को वनवास भेजने के लिए तैयार हो गई।
श्रीराम के राज्याभिषेक से कुछ समय पहले कैकयी ने अपने दो वर मांग लिए और जिद करके अपनी दोनों इच्छाएं पूरी करवा लीं।
दशरथ ने जब राम को बुलाया और ये बातें बताईं तो वे राम ने धैर्य बनाए रखा। शांत मन के साथ पिता की पूरा बात सुनी और पिता के वचन पूरे करने के लिए वनवास स्वीकार कर लिया।
राम वनवास जाने की तैयारी लग में गए तो दशरथ ने कैकयी को फिर से समझाने की कोशिश की। राजा ने कैकयी से कहा कि तुम राम को वनवास जाने से रोक लो। अगर तुम ये सोच रही हो कि वनवास भेजकर राम को कोई सजा दे रही हो तो तुम्हारी ये सोच गलत है। राम किसी से कोई शिकायत नहीं करेगा और चुपचाप वन चला जाएगा। राम कभी विचलित नहीं होता है।
दशरथ के समझाने के बाद भी कैकयी अपनी बात पर टिकी रहीं। जब राम वनवास जाने लगे तो लक्ष्मण और सीता भी उनके साथ चल दिए।
श्रीराम की सीख
इस किस्से में श्रीराम ने हमें संदेश दिया है कि हमें हर परिस्थिति के लिए हमेशा तैयार रहना चाहिए। अयोध्या में सभी इस बात से खुश थे कि राम का राज्याभिषेक होगा, लेकिन एक ही रात में पूरा दृश्य ही बदल गया। राम के वनवास की बातें सुनकर सभी निराश थे, लेकिन राम ने सकारात्मक सोच के साथ नई परिस्थितियों के स्वीकार किया और वनवास चले गए। ऐसा जरूरी नहीं कि हम जैसा सोचेंगे, वैसा ही हो। कभी-कभी हमारी सोच विपरीत बातें भी घट जाती हैं। हमें ऐसे हालातों में भी धैर्य नहीं खोना चाहिए और मन को शांत रखना चाहिए।