जानिए प्रयाग, हरिद्वार, नासिक और उज्जैन में ही क्यों मनाया जाता है कुंभ मेला

प्रयाग, हरिद्वार, नासिक और उज्जैन, इन चार नगरों में जिन्हें धार्मिक दृष्टि से तीर्थ नगरी की मान्यता मिली हुई है। यह मान्यता परंपरा से है। महर्षिवेद व्यास प्रणीत 18 पुराणों तथा 18 उपपुराणों एवं अन्य‍ पुराणों में उपर्युक्त तीर्थों का प्रसंगानुसार उल्लेख हुआ है। भारत माता मंदिर हरिद्वार के संस्थापक निवृतमान शंकराचार्य स्वामी सत्य‍मित्रानंद गिरि महाराज के शिष्य जबलपुर के महामंडलेश्वनर स्वामी अखिलेश्वारानंद गिरि महाराज ने बताया कि उक्त चारों तीर्थों में ही कुंभ महापर्वों का आयोजन सदियों से होता आया है। भारतीय कालगणना का आधार ज्योतिषीय पंचांग अनुसार ग्रह-नक्षत्रों, तिथि, योग आदि के आधार पर सूर्य का विभिन्न राशियों में जब संक्रमण (प्रवेश) होता है तब-तब कुंभ महापर्व के संयोग बनते हैं। उपर्युक्त तीर्थों में स्थान अर्थात भूमि का महत्व है। दूसरे नंबर पर वहां की सदियों से प्रवाहमान नदी का तथा तीसरे नंबर पर वहां स्थापित देव स्थान और चौथे नंबर पर उस स्थान पर अतीत में घटित घटना के प्रसंगों का महत्व है। इस कारण भारतवर्ष में महाकुंभ जैसे धार्मिक महोत्सव प्रत्येक 12 वर्ष के क्रम में होते हैं।

उपर्युक्त संयोग और अवसरों पर भरने वाले महाकुंभ के पीछे पौराणिक गाथाएं और भारतीय ज्योतिषीय काल गणना के क्रम ग्रह नक्षत्रों के योग से शुभ मुहूर्तों का निर्माण होता है। ये पारंपरिक धार्मिक पर्व कुंभ अथवा महाकुंभ कहे जाते हैं।

-प्रयाग (इलाहाबाद) को तीर्थों का राजा कहा जाता है। तीर्थराज प्रयाग, यहां ती‍न पवित्र नदियों का मिलन केंद्र है। गंगा-यमुना और सरस्वती जिसे त्रिवेणी कहा गया है। यहां के देवता वेणी माधव हैं।

-हरिद्वार, यहां गंगा नदी का संयोग है। भारत के पुरातनकाल के सप्त। ऋषियों की यह तपस्थंली है। गंगा यहां सप्तल धाराओं में प्रवाहित होती है तथा दक्षेश्वेर महादेव, मनसादेवी, ज्वालादेवी, कुंजा देवी, नीलकंठ महादेव यहां के प्रमुख देव एवं देवियां हैं।

-ना‍सिक, यहां गोदावरी नदी का पवित्र संयोग तथा 12 ज्योर्तिलिंग में परिगणित एक ज्यो्र्तिलिंग का उल्लेख है और उनके अभिषेक पूजन का महत्व है।


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