हर इंसान के शरीर में चलता है समुद्र मंथन मन होता है जल और वासुकी नाग की तरह हर होती है आने-जाने वाली हर सांस

समुद्र मंथन देवताओं और राक्षसों के बीच हुआ था। इसके लिए मंदराचल पर्वत का इस्तेमाल किया गया। ये पर्वत अपने वजन के कारण समुद्र में डूब जाता, लेकिन उसको रोकने के लिए भगवान विष्णु ने कछुआ बनकर उसे अपनी पीठ पर टिकाया।

मंथन के लिए वासुकी नाग को रस्सी के रूप में इस्तेमाल किया गया। इसी तरह हर इंसान के शरीर में समुद्र मंथन चलता रहता है।

इंसान का शरीर 90% जल से बना होता है। जल और मन का कारक ग्रह चंद्रमा है। ये सबसे तेज गति से चलने वाला ग्रह है। विचारों की तेजी का कारक भी चंद्रमा ही है, इसीलिए शरीर में समुद्र मंथन चलता रहता है।

शरीर में मेरुदंड यानी रीढ़ की हड्‌डी मंदराचल पर्वत का प्रतीक है। ये हड्‌डी जहां रुकती है वो कछुए के आकार की हड्डी होती है। वहीं, हमारी एक सांस जो आ रही है और एक सांस जो जा रही है वो वासुकी नाग है। यानी इस तरह हम सभी लोगों में हर सांस के साथ जो विचार आते-जाते हैं उससे मंथन चलता रहता है।

इस तरह विचारों के साथ कोई स्टूडेंट अपनी हर सांस में डॉक्टर बनने का विचार करता है तो वह डॉक्टर बन जाता है। जो लोग बिजनेस में लक्ष्मी पाने के लिए मंथन करते हैं, वो धनवान हो जाते हैं। जो इंसान किसी भी तरह के अपराध का चिंतन हर सांस में करता है तो वो अपराधी बन जाता है।

इस मानव रूपी समुद्र से उसी प्रकार के विष, अमृत, दवा, वाहन, जीवनसाथी, रत्न, स्वास्थ, विद्या, वह प्राप्त करता है। ये ही समुद्र मंथन की कथा का सार है।



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