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अमरनाथ धाम की परम पावन कथा।

Updated on 01-01-1970 12:00 AM

आप सभी अमरनाथ धाम के बारे मे तो जानते ही होगे। यह धाम चार तीर्थ स्थलो मे से एक है। यह बहुत ही पवित्र तीर्थ स्थल है। ऐसा कहा जाता है कि जो भी मनुष्य अपने जीवन मे चार धाम की यात्रा कर लेता है उसके समस्त पाप कट जाते है तथा वह अंत समय मे मोक्ष पाने का अधिकारी हो जाता है। दोस्तो अमरनाथ गुफा जम्बू कश्मीर मे स्थित है।

इस गुफा मे बर्फ की शिवलिंग होती है इसे बाबा बर्फानी के नाम से भी जाना जाता है। यह शिवलिंग प्रत्येक वर्ष श्रावण मास मे चन्द्रमा के बढने के साथ ही भगवान शिव के प्रतीक हिम शिवलिंग रूप मे अवतरित होकर पूर्णिमा के दिन पूर्ण शिवलिंग बनकर तैयार हो जाता है तथा चन्द्रमा के घटने के साथ ही अमावस्या तक यह विलीन हो जाता है। प्रत्येक वर्ष लाखो की संख्या मे लोग अमरनाथ धाम मे दर्शन के लिये जाते है।

अमरनाथ धाम की कथा-

एक बार ऋषि और्व के आश्रम मे ऋषि धौम्य बिना ऋषि और्व के अनुमति के उनके आश्रम मे बैठकर ब्रम्हज्ञान प्राप्त करने के लिये शिव आराधना कर रहे थे। तभी ऋषि और्व ने ऋषि धौम्य से कहा कि तुम यह क्या कर रहे है तुम्हें यहाँ पर ब्रम्हज्ञान नही मिल सकता यदि तुम्हे ब्रम्हज्ञान चाहिए तो काशी मे जाकर शिव आराधना करो वहाँ पर तुम्हें ब्रम्हज्ञान मिल जायेगा।

लेकिन ऋषि धौम्य बिना कुछ बोले शिव आराधना मे लगे रहे चूँकि ऋषि धौम्य ऋषि और्व के शिष्य थे। बार-बार कहने के बावजूद भी जब ऋषि धौम्य ऋषि और्व की बात का कोई उत्तर नही दिया तो ऋषि और्व गुस्से मे आकर धौम्य ऋषि को श्राप दे डाला कि तुम कपोत पक्षी बनकर अज्ञान के अनंत आकाश मे हमेशा के लिये भटकते रहोगे। उसके बाद ऋषि धौम्य एक कपोत पक्षी मे परिवर्तित हो गये तथा आश्रम से बाहर चले गये। उसी समय देवर्षि नारद ऋषि और्व के आश्रम मे पहुच गये उन्होंने ऋषि और्व से कहा कि मैने तो आपकी बहुत प्रशंसा सुनी थी लेकिन आपने एक शिवभक्त को ही श्राप दे दिया ये आपने अच्छा नही किया।

तब ऋषि और्व बहुत पश्चाताप करने लगे कि अब मै क्या करू मुझसे बहुत बडी गलती हो गई। उस समय देवर्षि नारद ने कहा कि मै इसमे क्या बताऊ अब जो करेंगे वो शिव ही करेंगे। फिर ऋषि और्व वही बैठकर शिव आराधना करने लगे। उधर तीनो देवियां सरास्वती, पार्वती, महालक्ष्मी, तथा देवर्षि नारद ये सभी ब्रम्हज्ञान पाने के लिये बडे ही उत्सुक थे। माता पार्वती ने भगवान शिव से ब्रम्हज्ञान देने के लिये प्रार्थना की। भगवान शिव ने कहा कि देवी उचित समय आने पर आपको मै ब्रम्हज्ञान अवश्य दूँगा।

उसके बाद भगवान शिव समाधि मे लीन हो गये जब भगवान शिव की समाधि टूटी तब उन्होंने कैलाश पर्वत पर माता पार्वती को नही देखा तब वो माता पार्वती के पास गये वो बैठकर शिव आराधना कर रही थी। भगवान शिव ने माता पार्वती से कहा कि तुम यहाँ क्या कर रही हो तब पार्वती ने कहा कि मै शक्ति स्वरूपा हूँ मै खुद से ब्रम्हज्ञान प्राप्त कर सकती हूँ। भगवान शिव ने कहा कि देवी यह तुम नही तुम्हारा अभिमान बोल रहा है। जिसके अंदर अभिमान होता है वह ब्रम्हज्ञान नही प्राप्त कर सकता है।

इस बात पर माता पार्वती ने भगवान शिव से कुछ नही कहा तब भगवान शिव ने माता पार्वती से कहा कि चलिये आज मै आपको ब्रम्हज्ञान दूँगा। यह कहते हुये माता पार्वती तथा भगवान शिव आकाश मे गगन बिहार करते-करते अमरनाथ गुफा मे जा पहुचे। तब माता पार्वती ने भगवान शिव से कहा कि आप हमे यहाँ क्यो लाये है? तब भगवान शिव ने कहा कि हे देवी यदि इस ब्रम्हज्ञान की ध्वनि किसी भी मनुष्य या पशु पक्षी ने सुन लिया तो वह अमरत्व को प्राप्त हो जायेगा जिससे इस दुनिया की अर्थव्यवस्था डगमगा जायेगी।

तब माता पार्वती ने कहा कि हे प्रभू क्या शिव भक्त भी इस ब्रम्हज्ञान को नही सुन सकते जिससे की उनका कल्याण हो जाये। तब भगवान शिव बोले कि देवी ये आपका वात्सल्य बोल रहा है हम आपके इस बात का सम्मान करते है तथा शिक्त भक्तो को यह ब्रम्हज्ञान सुनने की आज्ञा देते है। उसके बाद भगवान शिव ने डमरू बजाकर भयंकर नाद किया जिसकी वजह से सभी पशु पक्षी इस स्थान से काफी दूर चले गये।

उसके बाद भगवान शिव ने अपने तथा माता पार्वती के लिये आसन बिछाया और दोनो आसन पर बैठ गये। भगवान शिव ने माता पार्वती से कहा कि मै समाधि रूप मे तुम्हे ब्रम्हज्ञान दूँगा तुम हुँकार जरूर भरना ताकि हमे यह पता चले कि तुम इस ब्रम्हज्ञान को सुन रही हो तब माता पार्वती ने हुँकार करके हाँ कहा।

ब्रम्हज्ञान की कथा-

भगवान शिव ने माता पार्वती से कहा कि ब्रम्हज्ञान की कथा अत्यंत रहस्यमयी तथा कठिन है। हम ब्रम्हज्ञान तुम्हे समाधि अवस्था मे प्रदान करेंगे। ब्रम्हज्ञान को सुनते समय आपको हाँ कहना होगा जिससे हमको पता चल सके कि तुम कथा को सुन रही हो। फिर भगवान शिव माता पार्वती को ब्रम्हज्ञान की कथा सुनाने लगे उन्होंने कहा कि तुम्हे यह ज्ञात होगा कि हमने पूर्व काल मे पंच कौशिक नगरी का निर्माण किया था इस पर देवी ने हाँ कहा।

उस पंच कौशिक नगरी मे भगवान विष्णु ब्रम्हज्ञान प्राप्त करने के लिये ऊँ नमः शिवाय का जाप कर रहे थे। हमारे पंचाक्षरी मंत्र के निरंतर जाप से एक दिव्य ऊँ का निर्माण हुआ। उस दिव्य ध्वनि से आनन्द की लहरे उठने लगी। श्री हरि विष्णु का सम्पूर्ण शरीर इस आनन्दमयी लहरो का सुखद अनुभव करने लगा। ब्रम्हज्ञान ही शिव का स्वरूप है। जो जीवत्मा इस ब्रम्हज्ञान को प्राप्त कर लेता है वो आत्मा शिव तत्व मे समाहित हो जाता है।

शिव ही सत्य है। जो जीवात्मा इस ब्रम्हज्ञान को प्राप्त कर लेता है उसके जीवन मे और कुछ शेष नही बचता। इस ब्रम्हज्ञान को समाप्त कर जब भोलेनाथ बर्फ के शिवलिंग से बाहर आये तब उन्होंने देखा कि पार्वती तो रही है तो ये हमारे हर कथन पर हुँकार कौन भर रहा था। भगवान शिव ने कहा कि ऐसा कौन सा जीव है जो हमारे आज्ञा के बिना इस ब्रम्हज्ञान को सुन रहा था तुरंत सामने आओ। तब वह श्रापित कपोत पक्षी भगवान शिव के सम्मुख आकर खडा हो गया और भगवान शिव से बोलने लगा कि प्रभू मै ही वह पापी हूँ जिसने आपके दिये हुये ब्रम्हज्ञान को सुनने की चेष्ठा की। तब भगवान शिव ऋषि धौर्य को पहचान गये तथा भगवान शिव ने कहा कि यह सब मेरी ही लीला थी।

तुम्हे यहाँ पर आने की प्रेरणा मैने ही थी जिससे कि तुम श्राप से मुक्त हो सको। यह कहकर भगवान शिव ने ऋषि धौर्य को श्राप से मुक्त कर दिया इतने मे माता पार्वती नीद से जाग गई। उन्होंने भगवान शिव से कहा कि यह प्राणी इस पवित्र गुफा मे कैसे?तब ऋषि धौर्य ने माता पार्वती को प्रणाम करते हुये कहा कि माता मै भगवान भोलेनाथ की प्रेरणा से ही यहाँ आया हूँ। तब भगवान भोलेनाथ ने ऋषि धौर्य को कहा की  तुम्हारे गुरू ऋषि और्व भी शिव आराधना कर रहे है जाओ यह कथा अपने गुरू को भी सुनाओ भगवान शिव की आज्ञा पाकर ऋषि धौर्य वहाँ से चले गये।

तब माता पार्वती ने भगवान शिव से कहा कि मै आपके साथ होते हुये भी ब्रम्हज्ञान को नही सुन पाई यह कहकर माता पार्वती पश्चाताप करने लगी। तब भगवान भोलेनाथ ने कहा कि हे देवी तुम पश्चाताप मत करो यह सब हमारी ही लीला थी। तब माता पार्वती ने भगवान शिव से कहा कि हे प्रभू इस स्थान पर आने के बाद हमारा यहाँ से जाने का मन नही कर रहा है तब भोलेनाथ ने कहा कि देवी तनिक कैलाश पर्वत की भी चिंता करो वहाँ पर भी अपने शिव भक्त राह देख रहे होगें।

माता पार्वती के बार-बार कहने पर भगवान शिव ने कहा कि हम दोनो इस हिम शिवलिंग मे ज्योति रूप मे निवास करेंगे। जब तक तुम खुद यहाँ से चलने के लिये नही कहोगी तब तक हम यहाँ से नही जायेंगे। यह हिमलिंग प्रत्येक वर्ष श्रावण मास मे चन्द्रमा के बढने के साथ ही मेरा प्रतीक हिम शिवलिंग अवतरित होकर पूर्णिमा के दिन पूरा होगा तथा चन्द्रमा के घटने के साथ ही अमावस्या तक मुझमे विलीन हो जायेगा। यह गुफा अमरनाथ गुफा के नाम से प्रसिद्ध होगा।



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