काशी बनारस मे स्थित मणिकर्णिका घाट के बारे मे जरूर सुना होगा। ऐसा कहा जाता है कि जिस व्यक्ति का अंतिम संस्कार इस मणिकर्णिका घाट पर होता है उसे मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है। इस घाट पर 24 घंटे चिता जलती रहती है।
महाशमशान काशी मणिकर्णिका घाट का रहस्य-
यहाँ पर कार्तिक शुक्ल की चतुर्दशी अर्थात वैकुंठ चतुर्दशी और वैशाख माह मे स्नान करने का खास महत्व है इस दिन घाट पर स्नान करने से हर तरह के पाप से मुक्ति मिल जाती है।
यहाँ पर गंगा नदी के तट पर एक शमशान घाट है जिसे महाशमशान मणिकर्णिका घाट कहा जाता है। ऐसा कहा जाता है कि यहाँ के चिता की आग कभी शांत नही होती है। यहाँ प्रतिदिन लगभग 300 शवो का अंतिम संस्कार किया जाता है। ऐसी मान्यता है कि यहाँ पर जिस भी व्यक्ति का अंतिम संस्कार होता है उसे सीधे मोक्ष मिलता है। इस घाट पर 3000 साल से ज्यादा समय से यह कार्य हो रहा है।
इस महाशमशान मणिकर्णिका घाट पर चैत्र नवरात्रि के अष्टमी के दिन वैश्याओ के विशेष नृत्य का कार्यक्रम होता है ऐसा कहा जाता है कि ऐसा करने से उन्हे दोबारा अगले जन्म मे वैश्या नही बनना पडेगा उन्हे इस नर्क से मुक्ति मिल जायेगी।
इस महाशमशान मणिकर्णिका घाट पर फाल्गुन मास की एकादशी के दिन चिता की राख से होली खेली जाती है। ऐसा कहा जाता है कि इस दिन शिव रूप मे विश्वनाथ बाबा अपनी पत्नी पार्वती जी का गौना कराकर अपने देश लौटे थे। इनकी डोली जब यहाँ से गुजरती है तो इस घाट के पास के सभी अघोरी बाबा लोग नाच गाने रंगो से इनका स्वागत करते है।
दोस्तो इस स्थान पर माता सती के कान के कुंडल गिरे थे इसीलिये इसका नाम मणिकर्णिका है यहाँ पर माता सती का शक्तिपीठ भी स्थापित है।
यहाँ पर एक प्राचीन कुंड भी है जिसे भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से बनाया था। यहाँ पर भगवान शिव ने इसी कुंड मे स्नान किया था और उस स्थान पर उनके कान का कुंडल खो गया था जो कि आज तक नही मिला तब से उस कुंड का नाम मणिकर्णिका घाट पड गया। काशी खंड के अनुसार माँ गंगा के अवतरण से पहले इसका अस्तित्व है।
ऐसा कहा जाता है कि इस मणिकर्णिका घाट पर भगवान विष्णु ने सबसे पहले स्नान किया था इसीलिये वैकुंठ चौदस की रात के तीसरे पहर पर यहाँ स्नान करने से मुक्ति मिल जाती है यहाँ पर भगवान शिव की तपस्या पर भगवान विष्णु ने एक कुंड बनाया था।
प्राचीन समय मे माँ मणिकर्णिका की अष्टधातु की प्रतिमा इसी कुंड से निकली थी। ऐसा कहा जाता है कि यह प्रतिमा वर्ष भर ब्रम्हनाल स्थित मंदिर मे विराजमान रहती है परंतु अक्षय तृतीया को सवारी निकालकर पूजन दर्शन के लिये प्रतिमा कुंड मे स्थित 10 फिट ऊँचे पीपल के आसन पर विराजमान कराई जाती है इस दौरान कुंड का जल सिद्ध हो जाता है जहाँ पर स्नान करने से मुक्ति मिल जाती है।
ऐसा मान्यता है कि यहाँ पर भगवान भोलेनाथ ने माता सती का अंतिम संस्कार किया था इसी कारण यह घाट मणिकर्णिका शमशान घाट के नाम से प्रसिद्ध है।
ऐसा कहा जाता है कि यहाँ पर शवो से पूछा जाता है कि क्या उसने शिव के कान का कुंडल देखा? ऐसा भी कहा जाता है कि यहाँ पर जिस शव का दाह संस्कार किया जाता है अग्निदाह से पहले उससे पूछा जाता है कि क्या उसने भगवान शिव के कान का कुंडल देखा? ऐसी मान्यता है कि यहाँ पर भगवान शिव औघड़ स्वरूप मे विराजमान रहते है।
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