रमेश दुबे वर्तमान मीडिया सनातन मूल्यों और विरासत के गौरव से प्रेरणा नहीं ले रहा है जबकि आजादी की लड़ाई के समय सनातन मूल्यों और विरासत से प्रेरणा ली गई थी। आज के समय में सनातन मूल्यों और सनातन की गौरवपूर्ण विरासत का समुचित प्रचार-प्रसार पहले से अधिक हैं। मीडिया को भी यह ध्यान रखना चाहिए कि इस देश में जब तक सनातन का परचम लहरा रहा है तभी तक मानव मूल्यों, संवैधानिक संस्थाओं और संविधान का मान और अभिमान कायम है। जिस प्रकार से बाहरी और आतंरिक राष्ट्र विरोधी ताकते सनातन मूल्यों और परंपराओं को अपना निशाना बना रही है उनसे निपटने की जिम्मेदारी मीडिया समेत सभी जिम्मेदार लोगों की है। आजादी के बाद से देश में इस्लामीकरण और इसाई करण का एजेंडा जिस प्रकार से चलाया जा रहा है वह पूरा का पूरा षडय़ंत्र सनातन सभ्यता और संस्कृति को बर्बाद करने के लिए है। यह बात आवेश में नहीं कही जा रही है और न ही भड़काने वाली है। यह आने वाले समय में सच होने वाला है। सनातन विरोधी और राष्ट्र विरोधी ताकतों के खिलाफ अगर जिम्मेदार लोग एक राय होकर चुनौती का सामना नहीं करेगे तो बहुत बड़ा संकट खड़ा होगा। भारतीय सभ्यता केवल एक भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि हजारों वर्षों से विकसित होती आई सांस्कृतिक चेतना का नाम है। इस चेतना का मूल आधार सनातन जीवन-दर्शन है, जिसने सत्य, धर्म, कर्तव्य, त्याग, करुणा, सहिष्णुता, आत्मसंयम, प्रकृति के प्रति सम्मान और वसुधैव कुटुम्बकम जैसे सार्वभौमिक मूल्यों को जन्म दिया। भारत की राष्ट्रीय चेतना, सामाजिक संरचना और सांस्कृतिक विरासत पर इन मूल्यों की गहरी छाप रही है। भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान अनेक नेताओं, संतों, साहित्यकारों और पत्रकारों ने भारतीय परंपरा, आध्यात्मिकता और सांस्कृतिक विरासत से प्रेरणा लेकर जनजागरण का कार्य किया। उस समय का राष्ट्रीय विमर्श भारतीय अस्मिता, स्वाभिमान और सांस्कृतिक पुनर्जागरण से गहराई से जुड़ा हुआ था। इसके विपरीत आज यह प्रश्न बार-बार उठता है कि क्या समकालीन मीडिया भारतीय सनातन मूल्यों और सांस्कृतिक विरासत को उसी गंभीरता से प्रस्तुत करता है? यह विषय केवल मीडिया की आलोचना का नहीं, बल्कि उसकी सामाजिक भूमिका और उत्तरदायित्व के पुनर्मूल्यांकन का विषय भी है। भारत का स्वतंत्रता संग्राम केवल राजनीतिक स्वतंत्रता का संघर्ष नहीं था। वह सांस्कृतिक स्वाभिमान का भी आंदोलन था। विदेशी शासन ने केवल आर्थिक और राजनीतिक नियंत्रण स्थापित नहीं किया, बल्कि भारतीय संस्कृति और ज्ञान-परंपरा को भी पिछड़ा सिद्ध करने का प्रयास किया। इसके उत्तर में अनेक विचारकों ने भारतीय संस्कृति को राष्ट्रीय आत्मविश्वास का आधार बनाया। महर्षि दयानंद सरस्वती-महर्षि दयानंद सरस्वती ने वेदों की ओर लौटो का आह्वान किया। उनका उद्देश्य समाज को अंधविश्वास से मुक्त करते हुए वैदिक ज्ञान और आत्मगौरव की भावना जगाना था। इस विचारधारा ने राष्ट्रीय चेतना को नई दिशा दी। स्वामी विवेकानंद ने भारतीय आध्यात्मिक परंपरा को विश्व के सामने आत्मविश्वास के साथ प्रस्तुत किया। उन्होंने युवाओं से कहा कि भारत की शक्ति उसकी संस्कृति, आध्यात्मिकता और मानवीय मूल्यों में निहित है। उनके भाषणों ने स्वतंत्रता आंदोलन की मानसिक भूमि तैयार करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक-तिलक ने सार्वजनिक गणेशोत्सव और शिवाजी उत्सव को सामाजिक एवं राष्ट्रीय जागरण का माध्यम बनाया। धार्मिक-सांस्कृतिक आयोजनों को उन्होंने राष्ट्रीय एकता और स्वराज्य की चेतना से जोड़ा। महात्मा गांधी के सार्वजनिक जीवन में भगवद्गीता, रामायण और रामराज्य की अवधारणा का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है। उनके लिए धर्म का अर्थ किसी संप्रदाय विशेष का प्रचार नहीं, बल्कि सत्य, अहिंसा और नैतिकता पर आधारित सार्वजनिक जीवन था। गांधीजी नियमित रूप से भगवद्गीता का पारायण करते थे। उनका कहना था कि जब भी मुझे किसी प्रश्न का समाधान नहीं मिलता तो उसका समाधान मैं गीता में खोजता हूं। स्वतंत्रता आंदोलन का मीडिया -स्वतंत्रता आंदोलन के समय समाचार-पत्र केवल समाचार देने का माध्यम नहीं थे, बल्कि राष्ट्रीय चेतना के वाहक थे। उस समय के अनेक पत्र-पत्रिकाएँ भारतीय संस्कृति, स्वदेशी, भाषा, धर्म, साहित्य और राष्ट्रीय अस्मिता को प्रमुखता देती थीं। पत्रकारिता का उद्देश्य केवल सूचना देना नहीं, बल्कि समाज में जागरूकता और आत्मविश्वास उत्पन्न करना भी था। भारतीय इतिहास, महापुरुषों, तीर्थों, लोकसंस्कृति, त्योहारों और आध्यात्मिक परंपराओं पर व्यापक लेख प्रकाशित होते थे। इससे जनता में सांस्कृतिक जुड़ाव और राष्ट्रीय भावना का विकास हुआ। वर्तमान मीडिया का बदलता स्वरूप-स्वतंत्रता के बाद भारतीय मीडिया में उल्लेखनीय विस्तार हुआ। आज प्रिंट, टेलीविजन, डिजिटल मीडिया और सोशल मीडिया के माध्यम से सूचना का प्रसार पहले की तुलना में कहीं अधिक व्यापक और तेज़ है। साथ ही मीडिया का स्वरूप भी बदल गया है। बाज़ार, तकनीक, विज्ञापन, प्रतिस्पर्धा और दर्शकों की बदलती रुचियों ने उसकी प्राथमिकताओं को प्रभावित किया है। इस संदर्भ में कुछ आलोचकों का मत है कि सनातन सांस्कृतिक विरासत, भारतीय दर्शन और पारंपरिक ज्ञान को उतनी निरंतरता और गहराई से स्थान नहीं मिलता जितना मनोरंजन, तात्कालिक विवाद या सनसनीखेज विषयों को मिलता है। दूसरी ओर, कुछ लोग यह भी इंगित करते हैं कि आज अनेक टीवी चैनल, डिजिटल मंच और स्वतंत्र रचनाकार भारतीय इतिहास, मंदिरों, शास्त्रों, योग, आयुर्वेद और सांस्कृतिक विरासत पर पहले की तुलना में अधिक सामग्री भी प्रस्तुत कर रहे हैं। क्या वर्तमान मीडिया सनातन मूल्यों से प्रेरणा ले रहा है? मीडिया का एक वर्ग धर्म निरपेक्षता के चश्में से सबकुछ देख रहा है। धर्म निरपेक्षता एक ऐसा भ्रम है जो बैर के कांटे की तरह घेरे हुए हैं। सच यह है कि धर्म निरपेक्षता व्यवहारिक नही है यह केवल समाज के बहुसंख्यक वर्ग को ठगने का एक गहरा षडय़ंत्र है। बहुसंख्यक वर्ग सनातन धर्म को मानता है। इस्लाम के मानने वाले इस्लाम को मानते है। इसाई अपने धर्म को मानते है। ऐसे में राज्य जो धर्म को मानने वालों से बना हो वह धर्म निरपेक्ष होने का ढोंग करे तो इसका क्या परिणाम होगा। मुसलमान धर्म निरपेक्षता को नहीं मानता। वह धर्म निरपेक्षता को वहीं तक मानता है जहां वह उसके जिहाद के एजेंडे के प्रतिकूल नहीं है। यदि सनातन मूल्यों का अर्थ सत्य, कर्तव्य, सहिष्णुता, करुणा, आत्मसंयम, प्रकृति के प्रति सम्मान और लोककल्याण जैसे सिद्धांतों से है, तो यह अपेक्षा की जा सकती है कि मीडिया इन सार्वभौमिक मूल्यों को अपने कार्य-व्यवहार में अधिक प्रमुखता दे। वहीं यदि प्रश्न विशिष्ट धार्मिक या सांस्कृतिक प्रतीकों के कवरेज का है, तो विभिन्न माध्यमों और संस्थानों में इसकी मात्रा और शैली अलग-अलग दिखाई देती है। इसलिए यह कहना अधिक उचित होगा कि मीडिया के विभिन्न हिस्सों में भारतीय सांस्कृतिक विरासत के प्रति दृष्टिकोण समान नहीं है। बाज़ारवाद और समाचार की प्राथमिकताएँ आज अधिकांश मीडिया संस्थान तीव्र प्रतिस्पर्धा और आर्थिक दबाव के बीच कार्य करते हैं। परिणामस्वरूप— त्वरित समाचारों को प्राथमिकता मिलती है। विवाद और बहस अधिक आकर्षण पैदा करते हैं। मनोरंजन और सेलिब्रिटी समाचारों का विस्तार होता है। ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विषय अपेक्षाकृत कम समय पाते हैं। आलोचकों का मानना है कि इससे दीर्घकालिक सांस्कृतिक विमर्श के लिए उपलब्ध स्थान सीमित हो सकता है। भारतीय विरासत के सकारात्मक आयाम भारत की सनातन परंपरा केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है। इसमें शामिल हैं। वेद एवं उपनिषद, रामायण और महाभारत, योग, आयुर्वेद, भारतीय दर्शन, मंदिर स्थापत्य, शास्त्रीय संगीत, नाट्यशास्त्र, संस्कृत साहित्य, लोक परंपराएँ, प्रकृति संरक्षण, परिवार व्यवस्था गुरु-शिष्य परंपरा इन विषयों पर शोधपरक और संतुलित प्रस्तुति समाज को अपनी जड़ों से जोडऩे में सहायक हो सकती है। मीडिया की सामाजिक जिम्मेदारी-लोकतांत्रिक व्यवस्था में मीडिया को चौथा स्तंभ कहा जाता है। उसकी भूमिका केवल समाचार देना नहीं बल्कि— समाज को शिक्षित करना, सांस्कृतिक धरोहर का संरक्षण, राष्ट्रीय संवाद को समृद्ध बनाना, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और ऐतिहासिक समझ विकसित करना, विविध विचारों के लिए मंच उपलब्ध कराना भी है। इसी कारण यह अपेक्षा की जाती है कि मीडिया सांस्कृतिक विषयों पर भी तथ्यपरक, संतुलित और गहन सामग्री प्रस्तुत करे। स्वतंत्रता आंदोलन से मिलने वाली सीख-स्वतंत्रता संग्राम यह सिखाता है कि राष्ट्रीय आत्मविश्वास केवल आर्थिक शक्ति से नहीं आता, बल्कि अपनी संस्कृति, भाषा और इतिहास के सम्मान से भी जुड़ा होता है। उस काल में भारतीय परंपरा को आधुनिक राष्ट्रीय चेतना के साथ जोडऩे का प्रयास हुआ। आज भी यह संभव है कि सांस्कृतिक विरासत का अध्ययन आधुनिक संवैधानिक मूल्यों, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और समावेशी समाज की भावना के साथ किया जाए।