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केदारनाथ मंदिर में सोना लगाए जाने का क्या है इतिहास, कब-कब मंदिर का हुआ पुनर्निर्माण

Updated on 01-01-1970 12:00 AM

केदारनाथ मंदिर के गर्भगृह में दीवारों पर लगी सोने के परत पर विवाद छिड़ा है. सोने की परत की जगह पीतल की परत लगाने का आरोप मंदिर के वरिष्ठ पुजारी ने लगाया है. हालांकि मंदिर की समिति ने इसे पूरी तरह बकवास बताया है. इस मुद्दे पर राजनीति भी शुरू हो गई है. यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने भी इस संबंध में ट्वीट किया है.

केदारनाथ मंदिर चार धाम में से एक है, यह उत्तराखंड राज्य के रुद्रप्रयाग जिले में स्थित है. भगवान शिव के इस पावन स्थल का इतिहास बेहद प्राचीन है. ऐसा कहा जाता है कि मंदिर का निर्माण पांडवों ने कराया था. यहां पिछले साल ही दीवारों पर सोने की परत चढ़ाने का काम शुरू हुआ था. आइए समझते हैं कि पूरा मामला क्या है और केदारनाथ मंदिर में कब क्या महत्वपूर्ण बदलाव हुए.

क्या है पूरा मामला

केदारनाथ मंदिर में पिछले साल गर्भगृह की दीवारों पर सोने की परत चढ़ाने का काम शुरू हुआ था. इससे पहले यह दीवारें चांदी की थीं. इस काम के लिए मुंबई के एक व्यापारी ने 230 किलो सोना दान दिया था. अब मंदिर के पुजारी संतोष त्रिवेदी ने बद्रीनाथ केदारनाथ मंदिर समिति और संबंधित अधिकारियों पर घोटाले का आरोप लगाया है, उनका दावा है कि मंदिर की दीवारों पर पीतल की परत चढ़ाकर उस पर सोने का पानी चढ़ाया गया है. हालांकि BKTC ने इस दावे को गलत बताया है और दावा किया है कि इसी दानदाता ने बद्रीनाथ मंदिर में भी सोना जड़ने का काम कराया था. यह आरेाप सोची समझी साजिश के तहत लगाया जा रहा है.

महाभारत में है केदारनाथ का जिक्र

केदारनाथ का इतिहास बेहद पुराना है, महाभारत में भी इसका जिक्र मिलता है, ऐसा दावा किया जाता है कि मंदिर का निर्माण पांडवों ने कराया था. इसके पीछे यहां एक किवदंती भी है, ऐसा कहा जाता है कि महाभारत युद्ध के बाद गौत्र बंधुओं की हत्या के पाप से मुक्ति के लिए पांडव भगवान शंकर के पास केदारघाटी गए.

भोलेनाथ ने पांडवों को दर्शन न देने के लिए भैंसे का रूप रख लिया और जानवरों के बीच छिप गए. उन्हें ढूंढने के लिए भीम ने विशाल रूप रखकर घाटी के दोनों ओर पैर जमा लिए. जब भगवान शंकर पहचान लिए गए तो वह धरती में समाने लगे, तभी भीम ने उनका पृष्ठ भाग पकड़ लिया. इसके बाद भोलेनाथ ने प्रसन्न होकर पांडवों को दर्शन दिए. केदारनाथ मंदिर में भगवान भोलेनाथ के इसी पृष्ठ भाग का पूजन होता है.

पहले शंकराचार्य, फिर राजा भोज ने कराया पुनर्निर्माण

केदारघाटी में बाबा के धाम में लकड़ी और पत्थरों पर की गई सुंदर नक्काशी कत्यूरी शैली की बताई जाती है, ऐसा कहा जाता है कि पांडव वंश के राजा जन्मेजय ने मंदिर को पूरा कराया था. इसके बाद 8 वीं शताब्दी में आदि शंकराचार्य ने इसका पुनर्निर्माण कराया था. ग्वालियर से मिले राजा भोज के एक ताम्र पत्र में ये दावा किया गया है कि मंदिर का पुर्ननिर्माण 10 वीं शताब्दी में राजा भोज ने भी कराया था. हालांकि राहुल सांकृत्यायन ने ये दावा किया है कि मंदिर 12 और 13 वीं शताब्दी का है.

केदारनाथ मंदिर में सोना लगाने का इतिहास

केदारनाथ मंदिर में सोना लगाने के इतिहास का जिक्र नहीं मिलता है. हालांकि ऐसा दावा किया जाता है कि केदारनाथ मंदिर के निर्माण के बाद से 12 वीं शताब्दी तक यहां सोना-चांदी लगाया जाता था, इसके बाद यह प्रथा खत्म हो गई. पिछले साल जब यहां सोने की परत चढ़ाने काम काम शुरू हुआ था उससे पहले यहां दीवारों पर चांदी की परत चढ़ी थी. जब सोने की परत का काम शुरू हुआ तो पुजारियों ने विरोध किया था. उस वक्त केदार सभा के पूर्व अध्यक्ष महेश बगवाड़ी ने कहा था कि मंदिर की दीवारों पर सोना चढ़ाना हिंदू मान्यताओं और परंपराओं के अनुरूप है. उस वक्त BKTC के चेयरमैन अजेंद्र अजय ने भी कहा था कि यह सामान्य प्रक्रिया है, पहले छत लकड़ी से बनती थी, फिर पत्थर से बनी, इसके बाद तांबें की प्लेंटे आईं. उन्होंने विरोध को साजिश बताया था.

2013 में मची थी तबाही, ऐसे हुआ पुनरुद्धार

केदारनाथ में आज से 10 साल पहले 16 जून को महातबाही मची थी. यहां बादल फटने से आई बाढ़ की वजह से कई गांव और शहर तबाह हो गए थे. इस बाढ़ में हजारों की संख्या में लोग बह गए थे, इनमें से कई के शव आज तक मिल ही नहीं सके. इस बाढ़ में मंदिर को तो कोई नुकसान नहीं पहुंचा, लेकिन उसके आसपास सब तबाह हो गया था. इसके बाद इसका पुनरुद्धार पीएम मोदी के ड्रीम प्रोजेक्ट में से एक रहा. 2014 में सत्ता में आने पर सबसे पहले इसी परियोजना को हाथ में लिया गया. अब बाबा का धाम फिर अपने भव्य स्वरूप में लौट चुका है.



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