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हृदय में जहां उत्सव है, वहीं आनंद भी छिपा है

Updated on 01-01-1970 12:00 AM
चैतन्य से जुड़ने पर जीवन का आनंद प्राप्त होता है। आनंद के लिए हम लोग कहां-कहां नहीं भटकते और कैसे-कैसे उपाय करते हैं। लेकिन वह आनंद क्षणिक होता है। साधनों से प्राप्त आनंद कुछ समय बाद छूट जाता है। लेकिन अपने अंदर जो चैतन्य है, उससे जुड़ने पर जीवन का सच्चा आनंद प्राप्त होता है। हमें अपने जीवन में सदा यही प्रयास करना चाहिए कि हम अपने चैतन्य से जुड़े रहें।

कबीर ने अपने अंदर अनुभव किया, तब कहा, 'इस घट-अंतर बाग-बगीचे इसी में सिरजनहारा। इस घट-अंतर सात समुंदर इसी में नौ लख तारा। इस घट-अंगर पारस मोती इसी में परखनहारा। इस घट-अंतर अनहद गरजै इसी में उठत फुहारा।' यह पढ़ने-सुनने में आश्चर्य सा लगता है। साधक अपनी साधना की परम अवस्था में पहुंचने के बाद ही इसका अनुभव कर पाता है। हमारा आकर्षण सौंदर्य के प्रति हमेशा रहता है। क्यों? हम क्यों सुंदर चीजें और सुंदर रूप देखना पसंद करते हैं, उसे क्यों पाना चाहते हैं? क्योंकि हमारे अंदर भी सौंदर्य का अद्भुत खजाना बसा है। उस सौंदर्य को न निहार पाने के कारण हम एक तरह की अतृप्ति, एक प्यास, एक खालीपन महसूस करते हैं, और उसकी तलाश में बाहर के सौंदर्य की ओर आकर्षित होते हैं। कबीर कहते हैं ‘घट की वस्तु नजर नहीं आवे, बाहर फिरत गंवारा रे।’

विडंबना ही है कि नजदीक का सौंदर्य हमारी अनुभूति में नहीं आ रहा, इसलिए उसे बाहर तलाश कर रहे हैं। जितने भी संत-महात्मा हुए, उन सभी ने अलग-अलग ढंग से अपने अनुभव में यही बात कही और जीवन के इस रहस्यमय सौंदर्य को प्राप्त करने की प्रेरणा दी। जब मनुष्य मृत्यु को प्राप्त होता है तो उसका चेहरा ढक दिया जाता है, चाहे वह कितना ही सुंदर क्यों न हो, ऐसा क्यों? वह मृत काया हमें सुंदर क्यों नहीं लगती? सोने जैसी सुंदर देह को निष्प्राण हो जाने पर जला देते हैं या फिर जमीन में गाड़ देते हैं। इसका अर्थ यह है कि जीवन का असली सौंदर्य वह ‘प्राण शक्ति’ ही है, जिससे जीवन संचरित होता है। संत-महात्मा कहते हैं कि जीवन की सुंदरता तुम्हारे अंदर है। उसका आकर्षण ऐसा है, जैसे पतंगे का होता है। असली आकर्षण इस सांस के साथ, इस जीवन के साथ है जो हमारे अंदर है। लेकिन इसे पहचानना होगा। जीवन के इस सौंदर्य से परिचित हो कर ‘जीवन का उत्सव’ मनाया जाना चाहिए। इसके लिए कहीं जाने की जरूरत नहीं है, बल्कि अपने अंदर झांकना है और तृप्त हो जाना है।

जीवन के इस सौंदर्य में एक सुमधुर संगीत (अनहद नाद) है, एक थिरकन है, स्पंदन है, नृत्य है। इस नृत्य के साथ अपनी लय जोड़कर नृत्य का आनंद उठा सकते हैं, झूम सकते हैं। चूंकि जीवन शाश्वत है, रस और संगीतमय है, विलक्षण नृत्य से परिपूर्ण है, इसलिए भीतर तो जीवन का उत्सव हो ही रहा है। इसका आयोजन हमें नहीं करना है, सिर्फ अंतःकरण में जाकर उस उत्सव के साथ जुड़ जाना है। जीवन सरल, सहज और मधुर है। इसलिए अपने अंदर झांको और स्वर्ग के उपवन में भ्रमण करो और जीवन के मधुरस का पान कर कृत्य-कृत्य हो जाओ।


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