दोस्तो जब देवता और दैत्य दोनो मिलकर समुद्र मंथन कर रहे थे तब समुद्र के गर्भ से चौदह रत्न बाहर निकले थे। जिसमे से एक रत्न अमृत भी था। उस समय देवता और दैत्य दोनो अमृत पीने के लिये आपस मे लड रहे थे क्योंकि उसे जो भी पी लेता वो सदा-सदा के लिये अमर बन जाता उसे कोई नही मार सकता था। इसके निवारण के लिये भगवान विष्णु ने मोहिनी का रूप धारण किया था। मोहिनी ने सभी देवता और दैत्यो से कहा कि आप लोग आपस मे मत लडिये इस अमृत पर देवता और दैत्य दोनो का अधिकार है इसीलिये सबको अमृत मिलेगा।
अतः सभी देवता और दैत्य दो पंक्तियों मे बैठ जाये एक पंक्ति मे देवता बैठेंगे और दूसरे पंक्ति मे सभी दैत्य बैठेंगे। अतः मै सबसे पहले देवताओं को अमृत पिलाऊंगी उसके बाद दैत्यो को अमृत पिलाऊंगी। यह कहकर मोहिनी ने सबसे पहले देवताओं को अमृत पिलाना शुरू किया। दैत्यों मे एक राहू नाम का दैत्य था वो काफी होशियार था अतः उसने देवता का रूप धारण करके देवताओं की पंक्ति मे बैठ गया। मोहिनी ने उस पर ध्यान नही दिया और उसे अमृत पिला ही रही थी तो सूर्य और चंद्र ने कहा कि यह देवता नही है यह कोई बहरूपिया है जो देवता का वेश धारण करके हमारे पंक्ति मे बैठ गया है।
तब राहू अपने असली रूप मे आ गया और जोर-जोर हंसने लगा और कहने लगा कि अब मै अमर हो गया हूँ अतः अब मुझे कोई नही मार सकता है। तब भगवान विष्णु मोहिनी का रूप त्यागकर अपने असली रूप मज आ गये और अपने सुदर्शन चक्र से राहू का सिर धड से अलग कर दिया चूंकि राहू ने अमृत पी लिया था इसीलिये वह मरा नही। उसका सिर राहू और बाकी का धड केतू कहा जाता है। जब भगवान विष्णु ने राहू का सिर सुदर्शन चक्र से धड से अलग किया था उसी समय खून की कुछ बूंदे धरती पर आ गिरी जिससे लहसुन और प्याज की उत्पत्ति हुई। यही वजह है कि इन्हे खाने से इंसान के मुंह से गंध आती है।
इसके पीछे का एक वैज्ञानिक कारण भी है। आर्युवेद मे खाद्य पदार्थों को तीन भागो मे बांटा गया है सात्विक, राजसिक, तामसिक। लहसुन और प्याज को राजसिक और तामसिक मे रखा गया है। ये तामसिक चीजें मनुष्य मे कुछ केमिकल रिएक्शन को बढावा देती है जिससे उत्तेजना बढाने वाले हार्मोन शरीर मे ज्यादा प्रवाह होते है। अध्यात्म के अनुसार उत्तेजना से अध्यात्म के मार्ग पर चलने से समस्या उत्पन्न होती है जिससे एकाग्रता बाधित होती है और संयम क्षमता का नाश होता है। इसी कारण सनातन धर्म मे इन तामसिक चीजो के सेवन पर मनाही है।